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    टोंक की धरती पर घटा दिव्य चमत्कार, दीक्षा के 15 मिनट बाद मुनि विशाल सागर का देवलोकगमन

    जैन समुदाय की आंखों के सामने घटा विरल आध्यात्मिक प्रसंग, भावविह्वल हुआ टोंक
    टोंक। राजस्थान की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक धरती टोंक रविवार को एक अलौकिक दृश्य की साक्षी बनी, जब जैन मुनि दीक्षा के कुछ ही क्षण बाद एक नवदीक्षित संत का समाधि मरण हो गया। यह एक ऐसा भावनात्मक, चमत्कारी और आध्यात्मिक क्षण था, जिसने टोंक ही नहीं, सम्पूर्ण जैन समाज को स्तब्ध, श्रद्धा और विस्मय से भर दिया।
    दोपहर में अमीरगंज स्थित दिगंबर जैन नसिया मंदिर में चल रही जैन पत्रकारों की गोष्ठी “शांति समागम” के बीच जब परम पूज्य वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने अचानक यह संकेत दिया कि एक संत आज समाधि को प्राप्त होने वाला है, तब किसी को यह आभास नहीं था कि इतनी बड़ी आध्यात्मिक घटना कुछ ही पलों में घटने वाली है।
    जीवन के अंतिम क्षणों में मिली दीक्षा
    आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज की दिव्य दृष्टि और अंतरात्मा ने जब यह संकेत दिया, तो उन्होंने तत्काल क्षुल्लक श्री विशाल सागर जी को मुनि दीक्षा प्रदान करने का निर्णय लिया। दीक्षा विधि अत्यंत शांत, समता भाव और पारंपरिक अनुशासन के साथ सम्पन्न हुई। जनसमुदाय की आंखों के सामने केशलोंच करते हुए जब मुनि विशाल सागर जी ने “नमः सिद्धेभ्यः” उच्चारित किया, तो वातावरण श्रद्धा, स्तब्धता और आत्मिक ऊर्जा से भर गया।
    15 मिनट में निर्वाण की यात्रा
    दीक्षा के महज 15 मिनट बाद ही नवदीक्षित मुनि विशाल सागर जी महाराज ने पूर्ण समताभाव के साथ समाधि मरण को प्राप्त किया। यह दृश्य उपस्थित श्रद्धालुओं के लिए एक ऐसा क्षण था, जो शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। आंखें नम थीं, पर चेहरे पर एक अलौकिक शांति और संतोष था—जैसे किसी जीव ने जीवन की पूर्णता को अनुभव कर मोक्ष की ओर कदम बढ़ा लिया हो।
    टोंक की धरती पर विराजमान दिव्य चेतना
    समस्त जैन समाज ने एक स्वर में कहा, “जय हो आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज की दिव्य दृष्टि को!” यह दृश्य मानो यह प्रमाणित कर गया कि पंचम काल में भी ऐसे चमत्कारी और सिद्ध संत विराजमान हैं, जिनकी चेतना समय से परे है। संतों की दैवीय दृष्टि और मुनि विशाल सागर जी की अंतिम घड़ियों में प्राप्त तपोमय दीक्षा—यह प्रसंग जैन इतिहास में “निर्माण से निर्वाण तक” की दुर्लभ यात्रा के रूप में अमर हो गया है।
    भावनाओं से भरे श्रद्धालु, मौन में डूबा वातावरण
    दीक्षा और समाधि के बाद पूरे परिसर में गहरी शांति छा गई। श्रद्धालु भाव-विह्वल होकर एकटक उस स्थान को निहारते रहे जहां एक आत्मा ने मुनि पद प्राप्त कर कुछ ही क्षणों में देवलोक की ओर प्रस्थान कर लिया। श्रद्धांजलि सभा में वरिष्ठ मुनिराजों, जैन समाज के पदाधिकारियों व जनप्रतिनिधियों ने इसे जैन धर्म का जीवंत चमत्कार बताया।
    समाज के लिए एक दिव्य संदेश
    यह घटना केवल एक संत के निर्वाण की नहीं, बल्कि समस्त मानवता के लिए एक संदेश है कि मोक्ष का मार्ग कठिन नहीं, केवल समता, साधना और समर्पण से युक्त होना चाहिए। मुनि विशाल सागर महाराज का यह क्षणिक लेकिन पूर्ण संत जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जीवंत प्रेरणा बन गया है।
    जैन इतिहास में यह दिन ‘विरले संतों’ की श्रेणी में लिखी जाने वाली एक अमर गाथा बन चुका है – निर्माण से निर्वाण तक।
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