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    तीर्थंकरों को जाने बिना मिथ्यात्व एवं भटकाव समाप्त नहीं होगा-आचार्य पुलकसागर महाराज

    जो स्वाध्याय में विश्वास नहीं रखता उसे कोई भी मूर्ख बना सकता

    भीलवाड़ा। हम जैन कुल में जन्म लेने से अपने भगवान तीर्थंकरों को मानते तो है लेकिन उनके बारे में जानते बहुत कम है। जब तक उनको जानेंगे नहीं उनके प्रति दृढ़ श्रद्धा एवं आस्था कैसे उत्पन्न होगी। ऐसा हुए बिना हमारा मिथ्यात्व एवं भटकाव समाप्त नहीं होने वाला है। ये विचार श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट, मैन सेक्टर शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से भीलवाड़ा में पहली बार चातुर्मास कर रहे राष्ट्र संत मनोज्ञाचार्य पुलकसागरजी महाराज ने शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में शनिवार को चातुर्मासिक प्रवचन में व्यक्त किए।

    उन्होंने कहा कि हम जिनके बारे में जानते नहीं उनके बारे में विश्वास कम संदेह (डाउट) व संशय ज्यादा रखते है। शास्त्रों में इसी सशंय को मिथ्यात्व कहा गया है। हम पूजा आराधना व भक्ति के कार्य करते है तो भी मन में विश्वास कम संशय ज्यादा होता है कि फल प्राप्त होगा या नहीं। हम तीर्थंकरों की पूजा तो करते है लेकिन उनके बारे में जानते नहीं है। स्वाध्याय नहीं करने से ऐसी स्थिति बनती है। जो स्वाध्याय नहीं करता उसे कोई भी मूर्ख बना सकता है।

    आचार्यश्री ने कहा कि जीवन में कुछ चीजे श्रद्धा व विश्वास की, कुछ चीजे अनुभूति एवं कुछ चीजे दृश्यवान होती है। हमारा शरीर दृश्यवान, आत्मा अनुभव का ओर सिद्ध भगवान श्रद्धा का विषय है। इन तीनों पर जिसको विश्वास हो जाए उस सम्यक दृष्टि कहते है। सुख दुःख अनुभूति मात्र है जिन्हें देख नहीं सकते लेकिन महसूस कर सकते है। उन्होंने कहा कि भगवान के प्रति हमारी श्रद्धा व विश्वास होता है जिनकी अनुभूति नहीं होती देख भी नहीं सकते लेकिन वह है ये भाव प्रबल होता है। सम्यक दर्शन जिसे हो जाए वह दृश्यवान ओर अदृश्यवान दोनों के बारे में जानता है।

    आचार्य पुलकसागर महाराज ने कहा कि तीर्थंकरों के प्रति हमारी श्रद्धा अटूट एवं दृढ़ होनी चाहिए। तीनों लोकों की संपदा होने पर भी उन्हें राग द्वेष, मोह माया का भाव नहीं आता है। तीर्थंकरों न कोई हर्ष न कोई विषाद होता है। हमारे जीवन में पांखड़ भरा होने ओर संशय नामक मिथ्यात्व गहरा होने से तीर्थंकरों व धर्म के प्रति भी मन में डाउट रहता है। हम राम, सीता, चंदनबाला, मैनासुंदरी के जयकारे तो लगाते है लेकिन उनके जैसा बनना ओर वैसा जीवन जीना नहीं चाहते है। उन्होंने कहा कि शरीर का बनना मिटना उसका स्वभाव है जिसे पुद्गल कहते है।

    आत्मा अजर अमर होती है। पुद्गल दो प्रकार का शुभ ओर अशुभ होता है। शुभ पुद्गल होने पर शरीर सुंदर दिखेगा ओर अशुभ पुद्गल होने पर बदसूरत दिखता है। किसी से प्रेम किसी से नफरत उसके पुद्गलों का परिणाम है। तीर्थंकरों के जीवन में पुण्य ही पुण्य होने से उनको सुंदर शरीर ओर मीठी वाणी मिलती है। तीर्थंकर के गर्भ में आते ही माता को अवधि ज्ञान हो जाता है ओर उसके सारे कष्ट व कषाय दूर हो जाते है।

    श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष प्रवीण चौधरी ने बताया कि आचार्य पुलकसागर महाराज के सानिध्य में पर्युषण (दशलक्षण) पर्व की साधना 16 से 25 सितम्बर तक सूर्यमहल में होगी। इस अवधि में दस दिवसीय पाप नाशनम शिविर का भी आयोजन किया जाएगा। इस शिविर के लिए अब तक सैकड़ो श्रावक श्राविकाएं पंजीयन करा चुके है।

    प्रवचन के शुरू में दीप प्रज्वलन,पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट का सौभाग्य नरेश, नितिन,पीयूष गोधा परिवार ने प्राप्त किया। चातुर्मास समिति के संयोजक मनीष शाह एवं सह संयोजक लोकेश अजमेरा ने बताया कि प्रतिदिन चातुर्मासिक प्रवचन सुबह 8.30 से 10 बजे तक सूर्यमहल में हो रहे है। शाम 7 से 8 बजे तक आनंद यात्रा एवं आरती का आयोजन किया जा रहा है जिसमें भी शहर के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु शामिल होकर लाभ प्राप्त कर रहे है।

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