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    दुर्भाग्य हमारा : नगरीय निकायों में पांच वर्ष में बोर्ड बदल जाते, लेकिन हालात नहीं बदलते

    चुनावी वादों का मानसून बरसने को तैयार, घर आने वालों से ‘‘पुराना हिसाब’’ जरूर लेना

    बात चुनाव की- निलेश कांठेड़

    राजस्थान में मानसूनी सीजन में भी आसमान से पानी वाले बादल भले पूरी तरह नहीं बरस रहे हों, पर शहरी सरकारों को चुनने के लिए चुनावी सीजन में वोट पाने की खातिर वादों के बादल बरसने में किसी अलनीनो का खतरा नहीं है। यानी ये पूरी ताकत से बरसने को तैयार हैं। इन वादों की बारिश के लिए चुनावी मानसून का आगाज हो चुका है। हर पांच वर्ष में आने वाले इस मानसून में वादों की बारिश को बरसाने वाले भले कभी नहीं थकते हों, पर वादे झेलते-झेलते इन पर भरोसा करने वाला निरही मतदाता अवश्य थक चुका है। पुराने वादों का हश्र देख उसे अब नगरीय निकायों में प्रमुख या पार्षद बनने वालों के वादों पर किसी किस्म का एतबार ही नहीं रहा है।

    भीलवाड़ा नगर निगम सहित राज्य के कई नगरीय निकायों में आज 31 अगस्त को नामांकन पत्र भरने का काम पूरा होते ही प्रत्याशियों का मतदाताओं के घर तक पहुंचना शुरू होने वाला है। कई वार्डों में चेहरे बदले हुए दिखेंगे तो कई में वही पुराने चेहरे नए वादों के साथ और पिछले वादे पूरे नहीं करने के पीछे सफाई की पोटली लेकर मत की गुहार लगाने आएंगे। इनमें कोई चेहरा भाजपा के सिंबल के साथ तो कोई चेहरा कांग्रेस के सिंबल के साथ आपके यहां वादों की पोटली लेकर आने वाला है। कुछ चेहरे निर्दलीय के रूप में आपको ये भरोसा दिलाने आएंगे कि इन बड़ी पार्टियों पर नहीं, हम पर विश्वास करके देखो, हम वादों पर खरा उतरेंगे। कोई स्वधर्मी या स्वजाति का होने की दुहाई देकर आपसे वोट की गुहार लगाएगा।

    आप किसको वोट दें, यह आपको तय करना है, पर इतना जरूर ध्यान रखना है कि पिछली बार जिसे आपने चुना, उसने पांच साल में क्या किया। यदि वही चेहरा फिर सामने है तो लेखाजोखा सामने रखकर जहां भी कमियां हैं, उसके लिए जवाब अवश्य मांगें। चेहरा नया है तो जिसे वोट देने जा रहे हैं, उसके चेहरे के पीछे का चेहरा अवश्य टटोल लें, ताकि वोट देने के कुछ दिन बाद ये नहीं कहना पड़े कि हमने गलत चेहरा चुन लिया। जिसे वोट देने जा रहे हैं, उसके गुण-अवगुण जरूर देख लें। गुणों का पलड़ा भारी लगे तो वोट देने का विचार करें और अवगुण का पलड़ा भारी हो जाए तो मजबूत विकल्प पर विचार करें। किसी बड़े नाम या राजनीतिक कद के प्रभाव में आकर नहीं, मात्र ये देखकर वोट करें कि जिसे आप चुनने जा रहे हैं, वह आपके सुख-दुःख में साथ दे पाएगा या नहीं।

    ये चुनाव कोई देश या राज्य का भविष्य तय नहीं करने वाले, पर जिन प्रतिनिधियों को हम चुनेंगे, वह ये जरूर तय करेंगे कि हमारा शहर अगले पांच साल में कैसा स्वरूप लेगा। आने वाले पांच साल में गंदगी, अतिक्रमण, बंद रोड लाइट, टूटी-फूटी सड़कें, सड़कों पर घूमते मवेशी जैसी समस्याओं से निजात मिलेगी या हालात बदतर होंगे, ये हमारा वोट तय करेगा। हमारा वोट बिना किसी प्रलोभन या धर्म या जाति से प्रभावित हुए उसे मिले, जो यूज एंड थ्रो पॉलिसी वाला नहीं, बल्कि चुनाव के साथ भी और चुनाव के बाद भी हमारे साथ रहने वाला हो।

    चुनाव के बाद जो प्रत्याशी आपसे दूर हो जाने वाला हो, उसे किसी कीमत पर नहीं जिताएं। ऐसा नहीं हो कि चुनाव में वोट जिस चेहरे को देने जाएं, जीतने के बाद समस्याएं बताने के लिए उनके पति या पिता के पास जाएं। महिला प्रत्याशी ऐसी चुनें, जो खुद अपने बल पर फैसले लेने और मतदाताओं की समस्याओं के लिए संघर्ष करने की क्षमता रखती हो।

    ये हमारा दुर्भाग्य ही कहां जाएगा कि हर पांच वर्ष में पार्षद या निकाय मुखिया के चेहरे या दल बदल जाते हैं, लेकिन नहीं बदलती है तो उस नगर की सूरत। कुर्सी संभालने वाला पहले वर्ष से लेकर पांच वर्ष तक यही रोना रोता है कि पिछले बोर्ड ने हालात खराब कर दिए, हम उसे सुधारने का प्रयास कर रहे हैं।

    ऐसा बोर्ड इस बार नहीं बनाएं, जो पुराने दुखड़े रोए, बल्कि ऐसा बोर्ड बनाएं, जो बदतर मिले हालात को भी सुधार कर विकास की नई रेखाएं खींचने की क्षमता रखता हो। ऐसा बोर्ड तभी बन पाएगा, जब हम उनको चुन पाएंगे, जो पांच वर्ष में मालामाल बनने का ख्वाब पालकर नगरीय निकाय में नहीं आएं, बल्कि वार्ड या शहर को परिवार मानकर उसके दुःख दूर करने के लिए अपना तन, मन, धन सब कुछ समर्पित करने का विश्वास दिला पाएं।

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