विभिन्न संगठनों में नीलगाय हत्या से भारी रोष, सरकारी जांच रिपोर्ट पर उठे गंभीर सवाल
जयपुर। राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े भले ही प्रदेश में किसानों की फसल रक्षा के नाम पर वन्यप्राणी नीलगाय की हत्या के कानूनी प्रावधानों से सहमत नहीं हैं, लेकिन प्रदेश के वन महकमे के बड़े अधिकारियों ने राज्यपाल द्वारा इस संवेदनशील मामले में संज्ञान लेने के बावजूद लीपापोती करते हुए गुमराहपूर्ण रिपोर्ट तैयार कर दी। इस जांच रिपोर्ट का हाल ही में खुलासा हुआ है, जिसमें कई चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए हैं।
गौरतलब है कि राजस्थान नीलगाय रक्षा आंदोलन टीम की ओर से ओमप्रकाश गुप्ता ने राज्यपाल को इस संबंध में ज्ञापन देकर हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया था। राज्यपाल ने सकारात्मक कार्रवाई का भरोसा देते हुए कहा था कि जीव हत्या किसी समस्या का हल नहीं हो सकती। राज्यपाल को भेजा गया पत्र केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, नई दिल्ली को कार्रवाई के लिए भेजा गया।
इसके बाद मंत्रालय की ओर से संयुक्त निदेशक सुनील शर्मा ने अपने पत्र संख्या WL-8/160/25 के माध्यम से राजस्थान वन विभाग के चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन से कार्रवाई करने और विस्तृत जांच रिपोर्ट तलब की थी।
वन अधिकारियों से ऑनलाइन बैठक में मांगी गई जानकारी
विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार केंद्र के निर्देश पर राजस्थान के प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक की शाखा में 15 अक्टूबर 2025 को राजस्थान के समस्त वन संरक्षकों (प्रादेशिक एवं वन्यजीव) के साथ नीलगाय हत्या कानून को वापस लेने के बाबत ऑनलाइन बैठक आयोजित की गई। बैठक में विभिन्न वन क्षेत्रों के अधिकारियों से नीलगायों की हत्या से जुड़े प्रावधानों और किसानों द्वारा मांगी गई अनुमति के संबंध में जानकारी ली गई।
बैठक में मुख्य वन संरक्षक एवं उप वन संरक्षक जोधपुर, कोटा, जैसलमेर, सिरोही, जयपुर, अलवर, दौसा, झुंझुनूं, सीकर, जयपुर उत्तर, भरतपुर, अजमेर, धौलपुर, मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व कोटा, रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व, उप वन संरक्षक बूंदी, सरिस्का बाघ परियोजना के क्षेत्र निदेशक सहित अन्य अधिकारियों ने भाग लिया।
अधिकारियों से सीधे पूछा गया कि उनके क्षेत्र में फसल रक्षा के लिए कितने किसानों ने नीलगायों को मारने की अनुमति मांगी और कितनों को अनुमति दी गई? बैठक में अधिकारियों का जवाब था कि उनके क्षेत्रों में किसी भी किसान ने नीलगायों की हत्या के लिए आवेदन नहीं किया और न ही किसी को इसकी अनुमति दी गई।
अवैध शिकार और मांस-चमड़ा बिक्री के मामलों पर भी सवाल
अधिकारियों से यह भी पूछा गया कि क्या उनके क्षेत्रों में गैर-कानूनी रूप से नीलगायों को मारने, यानी अवैध शिकार अथवा मांस और चमड़ी बेचने से संबंधित मामले सामने आए हैं? इसका जवाब भी नकारात्मक बताया गया।
इसके अलावा अधिकारियों से पूछा गया कि मौजूदा परिस्थितियों में नीलगाय हत्या संबंधी कानून को वापस लिया जाना चाहिए या नहीं। इस पर वन अधिकारियों का मत था कि कानून वापस लेने से नीलगायों की आबादी में अनियंत्रित वृद्धि हो सकती है और इससे फसलों की बर्बादी बढ़ सकती है।
कुछ वन अधिकारियों का यह भी मत था कि हत्या संबंधी कानून को निरस्त करने का अधिकार उच्च स्तर का विषय है। वहीं, जब यह पूछा गया कि क्या नीलगायों द्वारा कहीं मानव संघर्ष अथवा हमले जैसे मामले सामने आए हैं, तो इसका उत्तर भी नकारात्मक बताया गया।
सभी वन अधिकारियों से लिखित रिपोर्ट भी मांगी गई
राजस्थान वन विभाग, जयपुर के वरिष्ठतम अधिकारियों द्वारा अधीनस्थ प्रदेश के सभी वन महकमों के अधिकारियों के साथ हुई ऑनलाइन बैठक के बाद उनसे बैठक के निष्कर्षों के संबंध में लिखित पत्र भी मांगे गए। इन पत्रों में सभी अधिकारियों ने अपने-अपने क्षेत्र की रिपोर्ट दी।
कई अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि उनके क्षेत्रों में हरी घास और पानी की पर्याप्त व्यवस्था है तथा वन्यजीव नीलगायों के संरक्षण एवं सुरक्षा का कार्य लगातार किया जा रहा है। किसी भी पत्र में नीलगाय हत्या के लिए अनुमति दिए जाने की जानकारी नहीं दी गई। सभी ने यह भी कहा कि किसी किसान ने नीलगाय को मारने के लिए आवेदन नहीं किया।
इन सभी पत्रों के आधार पर राजस्थान वन विभाग के विशिष्ट शासन सचिव (वन) बीजो जाय ने अपने पत्र संख्या प.4(36) वन/2025-13940-पार्ट (1), दिनांक 13-12-2025 के माध्यम से केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, नई दिल्ली को अपनी 40 पृष्ठीय जांच रिपोर्ट भेजी।
जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद संगठनों में रोष
इधर इस जांच रिपोर्ट के हाल ही में सामने आने के बाद राजस्थान नीलगाय रक्षा आंदोलन से जुड़े अनेक संगठनों ने भारी रोष व्यक्त किया है। संगठनों ने आरोप लगाया है कि वन विभाग के अधिकारियों ने राज्यपाल द्वारा संज्ञान लिए जाने के बावजूद गंभीर मामले में लीपापोती करते हुए मीट माफिया को लाभ पहुंचाने वाली गुमराहपूर्ण जांच रिपोर्ट तैयार की।
आंदोलन से जुड़े ओमप्रकाश गुप्ता ने सरकारी जांच रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब खुद राजस्थान वन विभाग के तमाम अधिकारी यह मान रहे हैं कि उनके क्षेत्रों में किसी किसान ने नीलगाय की हत्या करने के संबंध में कोई आवेदन नहीं किया और न ही विभाग ने किसी को हत्या की अनुमति प्रदान की, तो फिर नीलगाय हत्या कानून को बनाए रखने की जरूरत क्यों बताई जा रही है?
‘नीलगाय हत्या के लिए कानून की जरूरत पर सवाल’
जिला आर्य समाज के प्रधान प्रदीप आर्य एडवोकेट ने कहा कि यह दुखद है कि प्रदेश में नीलगायों की जगह-जगह गैरकानूनी रूप से हत्या की जा रही है और मीट माफिया से जुड़े लोग इसमें शामिल हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों को यह दिखाई नहीं देता।
राजस्थान बंधुआ मुक्ति मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष राजेश याज्ञिक ने आरोप लगाया कि किसानों की आड़ में मीट माफिया के लोग बेलगाम बने हुए हैं, लेकिन हुक्मरानों ने राज्यपाल जैसे महामहिम को भी गुमराह करते हुए नीलगाय हत्या के कानून को वापस लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने इसे प्रदेश में अहिंसा, करुणा, दया और मानवता के पक्षधरों का खुला अपमान बताया।
शहर कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष सरदार प्रदीप सिंह ने कहा कि खुद को हिंदुत्व, सनातनी और गौभक्त बताने वाली भाजपा सरकार का दोहरा चेहरा सामने आया है। उन्होंने कहा कि नीलगाय जैसे निरीह वन्य प्राणी की हत्या के अमानवीय कानून को भारी जनविरोध के बावजूद सही ठहराया जा रहा है।
ऑल इंडिया यूथ फेडरेशन के प्रवक्ता एडवोकेट सचेंद्र कौशिक ने आरोप लगाया कि जांच रिपोर्ट मीट माफिया के पक्ष में जानबूझकर तैयार करवाई गई है। उन्होंने कहा कि यह रिपोर्ट तमाम वन्यजीव प्रेमियों के लिए खुली चुनौती है।
विभिन्न सामाजिक संगठनों ने भी जताई चिंता
जैन संस्कृति रक्षा मंच के मंत्री चंचल जैन, संयुक्त व्यापारी महासंघ के पूर्व अध्यक्ष दिनेश मलिक, शिव सेना के पूर्व जिला प्रमुख मुकेश दीवान, पर्यावरण मित्र संस्थान के अध्यक्ष मुरारी पाराशर, पालीवाल जैन महासभा के अध्यक्ष विजेंद्र जैन, श्री गोविंददेव जी मंदिर के पुजारी पंडित दिनेश शर्मा, श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर के आचार्य पंडित राजेंद्र शर्मा, दाऊजी मंदिर के अध्यक्ष अनिल चौधरी, पर्यावरण एवं जल चेतना समिति के जिलाध्यक्ष बिहारी पाराशर, श्री हनुमान मंदिर के पुजारी पंडित जुगल किशोर सहित अन्य लोगों ने भी राज्य सरकार द्वारा नीलगाय हत्या कानून को वापस लेने की मांग से इनकार किए जाने पर चिंता जताई है।
संगठनों का कहना है कि यदि नीलगायों के अवैध शिकार और हत्या पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हुआ तो वन्यजीवों के संरक्षण के साथ-साथ पर्यावरण संतुलन को भी गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। उन्होंने सरकार से जांच रिपोर्ट की निष्पक्ष समीक्षा कराने और नीलगायों की सुरक्षा को लेकर स्पष्ट नीति बनाने की मांग की है।
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