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    नगर पालिका के डंपिंग यार्ड न होने से उपजा विवाद, महिलाओं ने कचरा डालने से रोका,बीमारियों का खतरा बढ़ गया

    कचरे की बदबू और गंदगी के कारण बीमारियों का खतरा बढ़ गया


    मिशनसच न्यूज,   किशनगढ़बास। किशनगढ़बास नगर पालिका की वर्षों पुरानी कचरा निस्तारण की समस्या एक बार फिर गरमा गई है। मंगलवार को नगर पालिका द्वारा बासड़ा गांव में कचरा डंप करने पहुंचे टिप्परों और ट्रैक्टरों को गांव की महिलाओं ने विरोध करते हुए रोक लिया। महिलाओं ने साफ शब्दों में कहा कि अब उनके गांव में शहर का कचरा नहीं डलने देंगे।
    ग्रामीण महिलाओं का आरोप है कि कचरे की बदबू और गंदगी के कारण बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। “हमारे बच्चे, बुजुर्ग और मवेशी सब बीमार हो रहे हैं,” एक महिला ने बताया। उन्होंने नगर पालिका के वाहनों को गांव में घुसने नहीं दिया, जिससे उन्हें वापस लौटना पड़ा।
    दस वर्षों से जारी समस्या
    यह पहली बार नहीं है जब नगर पालिका को विरोध का सामना करना पड़ा हो। जानकारी के अनुसार, नगर पालिका के गठन के बाद बीते 10 वर्षों में किशनगढ़बास सहित बास, कृपाल नगर, तहनोली और खैरथल गांवों में कचरा डंप किया गया, लेकिन हर जगह स्थानीय विरोध के कारण डंपिंग रोकनी पड़ी। अब यही स्थिति बासड़ा गांव में सामने आई है।
    30 करोड़ खर्च, फिर भी डंपिंग यार्ड नहीं
    शहर की सफाई व्यवस्था और संसाधनों पर अब तक 30 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन आश्चर्य की बात है कि नगर पालिका अब तक अपना स्थायी डंपिंग यार्ड नहीं बना पाई है। कचरा प्रबंधन को लेकर नगर पालिका की नाकामी अब प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर भी सवालों के घेरे में है।
    कार्यवाहक ईओ ने क्या कहा
    कार्यवाहक ईओ मनीषा यादव ने बताया कि “बासड़ा गांव में डंपिंग को लेकर मंगलवार को महिलाओं ने विरोध किया, जिसके कारण टिप्परों को रोका गया। हालांकि बाद में समझाइश के बाद कुछ कचरा डलवाया गया, लेकिन शाम को फिर विरोध हुआ। अब व्यवस्था को लेकर पुनः विचार किया जाएगा।”
    डंपिंग यार्ड को लेकर ईओ ने जानकारी दी कि “निर्धारित डंपिंग यार्ड तक पहुंचने वाले रास्ते को रोक दिया गया है, जिसे जल्द ही खुलवाने के प्रयास किए जाएंगे।”
    डंपिंग यार्ड के अभाव में नगर पालिका की कचरा नीति अब जनविरोध का रूप लेती जा रही है। जब तक स्थायी समाधान नहीं होता, तब तक यह समस्या नगर पालिका के लिए सिरदर्द बनी रहेगी और आमजन के लिए स्वास्थ्य संकट।

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