प्रवचन में मुनि जीवन की साधना पर बोले आचार्य, कहा—महावीर के चश्मे से देखोगे तो समझ आएगा संतों का त्याग
भीलवाड़ा। धर्म हमारी बातों में नहीं आचरण में होना चाहिए। संतों की शैली अलग-अलग हो सकती पर सबका लक्ष्य एक ही महावीर के संदेश को जन-जन तक पहुंचाना है। जिनके बेटी होती वह सभी कन्यादान करते है, नोटो का दान करने वाले भी कम नहीं है पर जिनशासन की सेवा ओर समाज के लिए संतान का दान करने वाले माता-पिता दुर्लभ होते है। धन्य है वह माता पिता जिन्होंने महावीर के मार्ग पर जाने के लिए अपनी संतान सौंप दी।
ये विचार श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट, मैन सेक्टर शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से भीलवाड़ा में पहली बार चातुर्मास कर रहे राष्ट्र संत मनोज्ञाचार्य पुलकसागरजी महाराज ने शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में शनिवार को चातुर्मासिक प्रवचन में व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि मुनियों की बुराई करना आसान है लेकिन मुनि जैसा जीवन जीना बहुत मुश्किल होता है। मुनि बनने के लिए अपनी ख्वाहिशों एवं तमन्नाओं का त्याग करना पड़ता है। वासना में जीने वाले मुनियों का महत्व नहीं समझ सकते। मिथ्यादृष्टि से नहीं महावीर के चश्मे से देखो मुनि नजर आएंगे।
आचार्यश्री ने इस बात पर अफसोस जताया कि आज समाज में मुनियों के प्रति द्धेष भरा जा रहा है। पापियों ओर चाटुकारों के आगे पीछे घूमने वालों को मुनियों को नमस्कार करने में समयकत्व नष्ट होने का खतरा प्रतीत होता है। परमात्मा महावीर की परम्परा ओर उनके मुनियों की बुराई नहीं होनी चाहिए। मुनि साधना भगवान की करते है ओर जिंदगी श्रावक के बल पर जीते है।
उन्होंने शुद्धोपयोगी एवं शुभोपयोगी मुनि के भेद समझाते हुए कहा कि शुद्धोपयोगी मुनि चतुर्थ काल में होते थे वर्तमान पंचम काल के मुनि शुभोपयोगी होने से उनमें कोई रिद्धि नहीं होती है। शुभोपयोगी मुनि दिन में एक बार आहार, दो बार प्रतिक्रमण, तीन बार सामायिक एवं चार बार स्वाध्याय करते है जबकि शुद्धोपयोगी मुनि महीनों या वर्षो में एक बार आहार करते है, कोई दोष नहीं लगने से प्रतिक्रमण जरूरी नहीं होता तो हर पल सामायिक में रहते है ओर उनमें आगम समाहित रहता पढ़ना नहीं पड़ता।
आचार्य पुलकसागर महाराज ने कहा कि इस पांचवे काल में कोई समम्य दृष्टि वाला नहीं है इसलिए ये मत कहो कि हम सम्यक दृष्टि ओर वह मिथ्यादृष्टि है। शुद्धोपयोगी मुनि वितरागी होते है लेकिन शुभोपयोगी मुनि वितरागी नहीं होकर वैरागी होते है। ये वैरागी घर परिवार ओर सांसारिक पद प्रतिष्ठा, व्यापार सभी का त्याग करते है। इनका उपयोग अशुभ से शुभ में होने से यह शुभोपयोगी मुनि हो गए है।
उन्होंने कहा कि ऐसे मुनि वैरागी ओर धर्मानुरागी होकर तीर्थंकरों की स्तुति करते है एवं अशुभ कार्य एवं पापो से वैराग लेते है। तीर्थंकर वितरागी होने से मोक्ष गए पर वैरागी को मोक्ष नहीं होता। कई जन्मो तक वैराग धारण करने पर वह वितरागी होकर मोक्ष जा सकता है। शुभोपयोगी मुनि का वेश बाहर से शुद्धोपयोगी जैसा होता है पर परिणाम वैसा नहीं होता है।
श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष प्रवीण चौधरी ने बताया कि आचार्य पुलकसागर महाराज के सानिध्य में पर्युषण (दशलक्षण) पर्व की साधना 16 से 25 सितम्बर तक सूर्यमहल में होगी। इस अवधि में आयोजित होने वाले दस दिवसीय पाप नाशनम शिविर के लिए सैकड़ो श्रावक श्राविकाओं ने पंजीयन कराया है। प्रवचन के शुरू में दीप प्रज्वलन,पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट का सौभाग्य संभव,तनसुख,श्रेयांश,तन्मय गदिया परिवार ने प्राप्त किया।
चातुर्मास समिति के संयोजक मनीष शाह एवं सह संयोजक लोकेश अजमेरा ने अतिथियों का स्वागत किया। संचालन चातुर्मास समिति के महामंत्री जयकुमार पाटनी ने किया। प्रतिदिन चातुर्मासिक प्रवचन सुबह 8.30 से 10 बजे तक सूर्यमहल में हो रहे है। शाम 7 से 8 बजे तक आनंद यात्रा एवं आरती का आयोजन किया जा रहा है जिसमें भी शहर के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु शामिल होकर लाभ प्राप्त कर रहे है।
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