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    राजस्थान में चुनाव मुद्दे पर सियासत तेज, गहलोत ने सरकार को घेरा

    पंचायत चुनाव विवाद पर गहलोत का हमला, सरकार पर संवैधानिक उल्लंघन के आरोप

    जयपुर। राजस्थान में पंचायतीराज और शहरी निकायों के चुनाव नहीं होने को लेकर सियासत तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हमला बताया है।

    गहलोत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (Twitter) पर बयान जारी करते हुए कहा कि भाजपा सरकार की “अलोकतांत्रिक सोच” के कारण प्रदेश में संवैधानिक संकट गहराता जा रहा है।

    गहलोत ने कहा कि पंचायतों और नगरीय निकायों में एक साल से अधिक समय से चुनाव नहीं कराए गए हैं और उनकी जगह सरकारी प्रशासकों की नियुक्ति की गई है। उनके अनुसार यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि लोकतंत्र पर सीधा प्रहार है।

    उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 243E और 243U का हवाला देते हुए कहा कि इन प्रावधानों के तहत पंचायतों और नगरीय निकायों का कार्यकाल पांच वर्ष निर्धारित है और समय पर चुनाव कराना अनिवार्य है।

    गहलोत ने आरोप लगाया कि राजस्थान हाईकोर्ट के बार-बार निर्देशों के बावजूद सरकार चुनाव कराने को लेकर गंभीर नहीं है।

    उन्होंने कहा कि फरवरी, मार्च और नवंबर 2025 में कोर्ट ने निर्देश दिए, लेकिन सरकार ने इन्हें नजरअंदाज किया। अंततः 439 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने 15 अप्रैल 2026 की अंतिम समय सीमा तय की।

    साथ ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा एसएलपी खारिज कर इस आदेश को बरकरार रखने का जिक्र करते हुए गहलोत ने कहा कि न्यायपालिका ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है।

    पूर्व सीएम ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार परिसीमन, पुनर्गठन और “वन स्टेट, वन इलेक्शन” जैसे बहानों के पीछे छिपकर चुनाव टालने का प्रयास कर रही है।

    उन्होंने 2021 के विकास किशनराव गवाली मामले का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि ऐसे कारण चुनाव टालने का वैध आधार नहीं हो सकते।

    गहलोत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 243E, 243U और 243K का लगातार उल्लंघन और नागरिकों के मताधिकार को बाधित करना गंभीर मामला है।

    उन्होंने इसे “संवैधानिक विघटन” की स्थिति बताते हुए कहा कि 73वें और 74वें संविधान संशोधनों की मूल भावना—विकेंद्रीकरण और स्थानीय स्वशासन—को कमजोर किया जा रहा है, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

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