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    राजेंद्र प्रसाद जैन : समर्पण, सेवा और संगठन की प्रेरक यात्रा

    समाज को एकजुट करने, धार्मिक परंपरा को भव्यता देने और सेवा की ज्योति जलाए रखने के जो कार्य किए राजेंद्र जी ने 

    राजेश रवि, मिशनसच न्यूज। राजेंद्र प्रसाद जैन उस व्यक्तित्व का नाम है जो यह साबित करता है कि सेवा के लिए न उम्र मायने रखती है, न परिस्थिति। सेवानिवृति के बाद अधिकांश लोग विश्राम का मार्ग चुनते हैं, लेकिन राजेंद्र जी ने अपने जीवन के इस द्वितीय चरण में समाज के लिए वह ऐतिहासिक कार्य कर दिखाया जिसकी कल्पना भी कठिन है। एक सामान्य ग्रामीण परिवेश से निकलकर बैंकिंग क्षेत्र में तीन दशक से अधिक समय तक प्रतिष्ठापूर्वक कार्य करने के बाद उन्होंने समाज को एकजुट करने, धार्मिक परंपरा को भव्यता देने और सेवा की ज्योति जलाए रखने के जो कार्य किए, वे निस्संदेह प्रशंसनीय और प्रेरणादायक हैं। राजेंद्र जी को पिछले दिनों अलवर में आयोजित एक कार्यक्रम में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव व राजस्थान सरकार के वन मंत्री संजय शर्मा ने सम्मानित भी किया। 
    प्रारंभिक जीवन की नींव
    अलवर जिले के हरसाना गांव में जन्मे राजेंद्र प्रसाद जैन का बचपन एक सादगीपूर्ण वातावरण में बीता। उनके पिता श्री महावीर प्रसाद जैन गांव में एक छोटे व्यवसाय से जुड़े थे। परिवार में अनुशासन, मर्यादा और संस्कार की जो समृद्ध परंपरा थी, उसने बाल्यकाल से ही उनके व्यक्तित्व को गढ़ने का कार्य किया। गांव के विद्यालय से वर्ष 1973 तक दसवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे आगे की शिक्षा के लिए अलवर आए। व एम. कॉम. एल.एल.बी. की शिक्षा प्राप्त की। शहर में बढ़ते परिवेश और शैक्षणिक वातावरण ने उनकी क्षमताओं को निखारा और जीवन में आगे बढ़ने की पृष्ठभूमि तैयार की।

    नौकरी की शुरुआत और बैंकिंग क्षेत्र में उन्नति
    पढ़ाई के बाद वर्ष 1981 में उनका चयन राज्य बीमा एवं प्रावधायी निधि विभाग में हुआ। सरकारी सेवा में रहते हुए भी उनके मन में बैंकिंग क्षेत्र में जाने की इच्छा लगातार बनी रही। इसी आकांक्षा ने उन्हें नौकरी के साथ-साथ बैंक परीक्षाएँ देने के लिए प्रेरित किया। उनकी मेहनत बेकार नहीं गई और वर्ष 1985 में बैंक ऑफ राजस्थान में उनका चयन हो गया। पाली मारवाड़ में पहली नियुक्ति ने उन्हें नए वातावरण में कार्य करने और अनुभव प्राप्त करने का अवसर दिया।
    बैंकिंग क्षेत्र में उन्होंने अपने विनम्र व्यवहार, जिम्मेदारी की समझ और दक्षता के कारण सदैव सम्मान प्राप्त किया। वे जहां भी पदस्थापित रहे—चाहे नदबई हो या अलवर, दिल्ली हो या मुंबई—हर स्थान पर उन्होंने अपने कार्य को ईमानदारी और कर्मठता के साथ निभाया। वर्ष 2010 में बैंक ऑफ राजस्थान का आईसीआईसीआई बैंक में विलय होने पर वे आईसीआईसीआई बैंक के कर्मचारी बन गए और अपनी सेवाएँ जारी रखीं। लंबी और सफल सेवा यात्रा के बाद वर्ष 2018 में वे सीनियर मैनेजर पद से सेवानिवृत्त हुए।
    सेवानिवृति के बाद समाज सेवा का नया अध्याय
    सेवानिवृति अक्सर विश्राम और आराम का समय माना जाता है, लेकिन राजेंद्र जी के लिए यह समाज की सेवा का नया आरंभ था। धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों में उनकी रुचि पहले से ही थी, परंतु सेवानिवृति के बाद उन्होंने इसे व्यापक रूप दिया। समाज ने वर्ष 2023 में श्री चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन पंचायती मंदिर (पल्लीवाल, सैलवाल, जैसवाल), मुंशी बाजार अलवर का अध्यक्ष बनाया। मंदिर में धार्मिक अनुष्ठान करते रहने के साथ ही वर्ष 2025 में समाज ने उन्हें एक अत्यंत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी—जैन संत विज्ञानंद मुनि के चातुर्मास का आयोजन। यह कार्य केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि संगठन, अनुशासन, समन्वय और प्रबंधन—चारों ही स्तरों पर अत्यंत चुनौतीपूर्ण था।
    उन्होंने इस चुनौती को न केवल स्वीकार किया, बल्कि इसे ऐसी उत्कृष्टता के साथ पूरा किया कि अलवर के धार्मिक इतिहास में यह आयोजन विशेष अध्याय के रूप में दर्ज हुआ। चातुर्मास के दौरान जैन नसिया जी में समोशरण महामंडल विधान का आयोजन अलवर जिले में पहली बार किया गया। हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति, धार्मिक अनुष्ठानों की भव्यता और हर व्यवस्था का सुचारू संचालन इस बात का प्रमाण था कि राजेंद्र जी में नेतृत्व, प्रबंधन और सामाजिक समन्वय की अद्भुत क्षमता है। उनके शांत, संतुलित और सकारात्मक स्वभाव ने इस आयोजन की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    धार्मिक भावना और सामाजिक समर्पण
    धार्मिक आस्था और सेवा की भावना राजेंद्र जी के जीवन का अभिन्न हिस्सा रही है। सेवा की वास्तविकता वही समझ सकता है जो इसे निःस्वार्थ भाव से करता है। इसी भावना से प्रेरित होकर उन्होंने समाज के कई प्रमुख कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई। वर्तमान में वे श्री चंद्रप्रभु पल्लीवाल दिगंबर जैन पंचायती मंदिर के अध्यक्ष है। वे सकल जैन समाज के ओषधालय के कोषाध्यक्ष के रूप में कार्य कर चुके हैं। अपने बैंकिंग समय के दौरान भी उन्होंने समाजसेवा को प्राथमिकता देते हुए कई जनहित कार्य कराए।
    उन्होंने दिव्यांगजनों की सहायता, गरीब विद्यार्थियों को यूनिफॉर्म, जूते–जुराब, बोतलें, स्टेशनरी उपलब्ध कराने जैसे कई काम नियमित रूप से किए। इसके साथ ही उन्होंने शिक्षा के स्तर को बेहतर बनाने के उद्देश्य से कई स्कूलों में कंप्यूटर और प्रिंटर प्रदान किए। अपने पैतृक गांव हरसाना के विद्यार्थियों के लिए शौचालयों की वर्षों पुरानी समस्या थी। राजेंद्र जी ने इस समस्या का समाधान किया और वहां शौचालयों का निर्माण करवाकर बच्चों को सुविधा प्रदान की। राजस्थान के बाड़मेर क्षेत्र के एक विद्यालय में भी उन्होंने बच्चों के लिए जूते–जुराब और बोतलें उपलब्ध कराईं। इस प्रकार उनकी सामाजिक सेवा केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रही, बल्कि अलग-अलग स्थानों पर अनेक जरूरतमंदों तक पहुँची।
    परिवार—संस्कार और उन्नति का आधार
    किसी भी सफल व्यक्ति के जीवन में उसके परिवार का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। राजेंद्र प्रसाद जैन एक संस्कारित और सुदृढ़ परिवार से आते हैं। चार भाइयों में वे तीसरे नंबर पर हैं। बड़े भाई रघुवर दयाल जैन अध्यापक रहे, दूसरे नंबर के भाई कैलाश चंद जैन तहसीलदार पद से सेवानिवृत्त हुए और छोटे भाई महेंद्र जैन भी अध्यापक पद से सेवानिवृत्त हैं। चारों भाइयों के जीवन में शिक्षा, परिश्रम और समाज के प्रति दायित्व जैसी समान विशेषताएँ दिखाई देती हैं, जो उनके परिवार की श्रेष्ठ परंपरा का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
    राजेंद्र जी की धर्मपत्नी श्रीमती निशा जैन एक धार्मिक और संस्कारी विचारों वाली गृहणी हैं। परिवार में उनके योगदान ने एक शांत, संयमित और मूल्य आधारित वातावरण निर्माण किया है। दाम्पत्य जीवन में सरलता, सहयोग और दृढ़ विश्वास ने राजेंद्र जी की व्यक्तिगत और सामाजिक यात्रा को और अधिक सुदृढ़ किया।
    उनके दो पुत्र हैं—अकुंश जैन और गौरव जैन।
    अकुंश इंजीनियर हैं और गुरुग्राम की एक प्रतिष्ठित कंपनी में कार्यरत हैं। उनकी पत्नी नेहा जैन डीपीएस फरीदाबाद में शिक्षिका हैं। दो बच्चे रिशित और लाइसा परिवार की नई पीढ़ी में संस्कारों की गूंज बनकर आगे बढ़ रहे हैं।
    दूसरे पुत्र गौरव जैन चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और बदरपुर बॉर्डर पर अपनी प्रैक्टिस करते हैं। वे वर्तमान में गोवा में एक रिसॉर्ट के निर्माण में भी सक्रिय हैं। उनकी पत्नी माधवी जैन MBA की शिक्षित हैं और दो बेटियों रागी और छोटी बेटी की जिम्मेदार माँ हैं। दोनों पुत्रों के सफल और संतुलित जीवन में राजेंद्र जी के संस्कारों और मार्गदर्शन की स्पष्ट झलक दिखाई देती है।
    नेतृत्व क्षमता और मानवीय गुणों का अद्भुत संगम
    राजेंद्र जी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता उनका संतुलन, धैर्य और सहयोग की भावना है। वे निर्णय लेने में दृढ़ हैं, परंतु उनका निर्णय सदैव सामूहिकता पर आधारित होता है। वे प्रत्येक व्यक्ति की बात धैर्यपूर्वक सुनते हैं, शांतिपूर्वक समाधान निकालते हैं और सदैव सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। इसी कारण लोग उनके साथ काम करते हुए सहज अनुभव करते हैं और उनके नेतृत्व को आदर के साथ स्वीकार करते हैं।

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