शिव पुराण कथा में मन की स्थिरता का मंत्र, संत बोले—माला के साथ मन को भी फेरना जरूरी
चित्तौड़गढ़। राम द्वारा में आयोजित शिव पुराण कथा के दौरान संत दिग्विजय राम ने श्रद्धालुओं को मन की चंचलता, भक्ति और राम नाम सुमिरन के महत्व के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार वायु को रोकना कठिन है, उसी प्रकार मन की चंचलता को भी आसानी से नहीं रोका जा सकता, लेकिन निरंतर अभ्यास के माध्यम से मन को शांत किया जा सकता है। अभ्यास से ही सिद्धि प्राप्त होती है और मन को नियंत्रित कर अपने वश में किया जा सकता है।
संत दिग्विजय राम ने कहा कि मन को समझाने के लिए विवेक रूपी लकड़ी का सहारा लेना पड़ता है। जिस प्रकार पानी को ऊपर चढ़ाने के लिए किसी यंत्र की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार मन को नियंत्रित करने के लिए राम नाम का सुमिरन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि साधना में सबसे पहले तन को स्थिर करना चाहिए, इसके बाद मन भी धीरे-धीरे स्थिर होने लगता है।
राम सुमिरन से समाप्त होती है मन की चंचलता
संत ने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार सोना सुहागे से गल जाता है और नमक पानी में घुल जाता है, उसी प्रकार राम सुमिरन से मन की चंचलता समाप्त हो जाती है। उन्होंने कहा कि जीवन में परिस्थितियां निरंतर बदलती रहती हैं, लेकिन व्यक्ति की मनःस्थिति मजबूत और स्थिर रहनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि जिसकी मनःस्थिति मजबूत होती है, वह विपरीत परिस्थितियों में भी जीवन का आनंद ले सकता है। जहां मन की चंचलता समाप्त हो जाए, वही स्थान भक्ति के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। जब व्यक्ति अपने मन के अनुसार नहीं, बल्कि प्रभु के मन के अनुसार चलने लगता है, तब जीवन में सब कुछ अच्छा लगने लगता है।
माला के साथ मन को भी फेरना जरूरी
संत दिग्विजय राम ने कहा कि केवल माला फेरने से काम नहीं चलता, बल्कि माला के साथ-साथ मन को भी फेरना पड़ता है। निर्मल मन वाला व्यक्ति ही ईश्वर को प्राप्त कर सकता है, क्योंकि ईश्वर को छल-कपट पसंद नहीं है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति जैसी संगति करता है, उसके जीवन पर वैसा ही प्रभाव पड़ता है। जैसी संगत होती है, वैसी ही रंगत व्यक्ति के व्यवहार और विचारों में दिखाई देती है। संत ने कहा कि छोटी जगह में प्रपंच अधिक होता है, जबकि जगह जितनी बड़ी होती है, वहां प्रपंच उतना ही कम होता है।
ज्ञान रूपी जल से होती है मन की सफाई
संत ने श्रद्धालुओं से कहा कि खाली दिमाग को गलत विचार घेर सकते हैं, इसलिए मन को भगवत सुमिरन में लगाना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्नान करने से शरीर स्वच्छ होता है, लेकिन मन की सफाई ज्ञान रूपी जल से होती है।
मन के भीतर मौजूद विकारों को समाप्त करने के लिए राम नाम का सुमिरन आवश्यक है। उन्होंने श्रद्धालुओं को शुद्ध भाव और निर्मल चित्त के साथ भगवान का भजन करने का संदेश दिया।
कलयुग में अच्छे भाव से भक्ति का महत्व
कथा के दौरान संत दिग्विजय राम ने युगों में किए गए धार्मिक कार्यों के फल का उल्लेख करते हुए कहा कि सतयुग में तप, तीर्थ और दान का पूर्ण फल प्राप्त होता था। त्रेतायुग में इसका तीन-चौथाई, द्वापर में आधा और कलयुग में किए गए कार्य का एक-चौथाई फल प्राप्त होने की मान्यता है।
उन्होंने कहा कि अभी कलयुग की शुरुआत है और जब कलयुग का आधा समय बीत जाएगा, तब किए गए कार्य का केवल एक-आठवां फल मिलने की बात कही गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह फल भी व्यक्ति के अच्छे भाव और शुद्ध चित्त पर निर्भर करता है।
संत ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि जीवन में परिस्थितियां कैसी भी हों, व्यक्ति को अपने मन को स्थिर रखते हुए भगवत भजन में लगाना चाहिए। राम नाम का सुमिरन मन के विकारों को दूर कर व्यक्ति को शांति और आत्मिक आनंद की ओर ले जाता है।
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