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    वजीरपुर कन्या महाविद्यालय में सावित्रीबाई फुले जयंती, अज्ञानता व अंधविश्वास के खिलाफ संघर्ष का संदेश

    वजीरपुर कन्या महाविद्यालय में सावित्रीबाई फुले जयंती एवं नववर्ष पर व्याख्यान, प्रश्नोत्तरी व सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित, छात्राओं को मिला सम्मान।

    मिशनसच न्यूज, गंगापुर सिटी।

    राजकीय कन्या महाविद्यालय, वजीरपुर में देश की प्रथम महिला शिक्षिका, महान समाज सुधारक एवं नारी शिक्षा की प्रणेता सावित्रीबाई फुले की जयंती एवं नववर्ष के उपलक्ष्य में व्याख्यान, प्रश्नोत्तरी तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन श्रद्धा और प्रेरणादायी वातावरण में किया गया। इस अवसर पर छात्राओं को टॉफी वितरित कर नववर्ष की शुभकामनाएँ भी दी गईं।

    कार्यक्रम का शुभारंभ सावित्रीबाई फुले के जीवन, संघर्ष और उनके द्वारा किए गए ऐतिहासिक सामाजिक कार्यों पर केंद्रित विचारों के साथ हुआ। प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता में छात्राओं से सावित्रीबाई फुले के जीवन संघर्ष, नारी शिक्षा, सामाजिक सुधार आंदोलन एवं उनके योगदान से संबंधित प्रश्न पूछे गए, जिनका छात्राओं ने अत्यंत उत्साह और आत्मविश्वास के साथ उत्तर दिया।

    प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के परिणाम

    प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता में लक्ष्मी सैनी ने प्रथम स्थान प्राप्त किया, जबकि मनीषा बैरवा एवं खेलंती सैनी ने संयुक्त रूप से द्वितीय स्थान हासिल किया। नोडल अधिकारी प्रो. रमेश बैरवा ने प्रतियोगिता में भाग लेने वाली समस्त छात्राओं को प्रोत्साहित करते हुए नगद पुरस्कार देने की घोषणा की।
    प्रश्नोत्तरी का संचालन इतिहास प्रवक्ता महेंद्र कुमार धोबी द्वारा किया गया। कार्यक्रम का मंच संचालन डॉ. संपूर्णानंद गौतम ने किया, जबकि छायांकन का दायित्व सेमेस्टर प्रथम की छात्रा काजल कुमारी बैरवा ने निभाया।

    सावित्रीबाई फुले की कविता का प्रभावी पाठ

    कार्यक्रम के दौरान सावित्रीबाई फुले की प्रसिद्ध प्रेरणादायी कविता —
    “एक ही दुश्मन अपना, खदेड़ दें उसे हम सब मिलकर… उस दुश्मन का नाम है अज्ञान”
    का पाठ किया गया, जिसने उपस्थित छात्राओं को गहराई से प्रभावित किया और शिक्षा के महत्व को और अधिक सशक्त रूप से सामने रखा।

    “अज्ञानता, असमानता और अंधविश्वास के खिलाफ संघर्ष की प्रतीक हैं सावित्रीबाई फुले” – प्रो. रमेश बैरवा

    मुख्य वक्ता प्रो. रमेश बैरवा ने अपने उद्बोधन में कहा कि सावित्रीबाई फुले अज्ञानता, असमानता, अन्याय और अंधविश्वास के खिलाफ प्रबल प्रतिरोध की प्रतीक हैं। उन्होंने बताया कि सावित्रीबाई फुले ने अपने पति महान समाज सुधारक ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर रूढ़िवादी समाज की यातनाएँ सहते हुए जाति, धर्म और लिंग भेद से ऊपर उठकर समाज के हर वर्ग के उत्थान के लिए कार्य किया।

    उन्होंने कहा कि जब सावित्रीबाई फुले बालिकाओं को पढ़ाने के लिए घर से निकलती थीं, तो समाज के कुछ लोग उन पर कीचड़, गोबर, पत्थर और गंदगी तक फेंकते थे। इसके बावजूद वे अपने थैले में अतिरिक्त साड़ी रखती थीं और विद्यालय पहुँचकर साड़ी बदलकर पुनः शिक्षा का कार्य जारी रखती थीं। यह संघर्ष आज भी हमें अपने लक्ष्य पर अडिग रहने की प्रेरणा देता है।
    प्रो. बैरवा ने फातिमा शेख एवं उनके भाई उस्मान शेख के योगदान को भी विशेष रूप से रेखांकित किया, जिन्होंने फुले दंपति का हर कदम पर साथ दिया।

    शिक्षा और सामाजिक सुधार में ऐतिहासिक योगदान

    भूगोल प्रवक्ता डॉ. ऋषिकेश गुर्जर ने सावित्रीबाई फुले के महिला शिक्षा के क्षेत्र में किए गए प्रयासों पर प्रकाश डाला। वहीं छात्रा पायल सैनी, कविता जगरवाल एवं पिंकी सैनी ने सावित्रीबाई फुले के जीवन परिचय एवं संघर्ष पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
    उन्होंने बताया कि सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में माली समुदाय में हुआ था। वर्ष 1848 में पुणे में बालिकाओं के लिए पहला विद्यालय स्थापित किया गया। फुले दंपति ने कुल 18 विद्यालयों की स्थापना की। दलित समाज के उत्थान के लिए कई शैक्षिक ट्रस्टों की शुरुआत की तथा वर्ष 1863 में बालहत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना कर सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ ऐतिहासिक कदम उठाया।

    बड़ी संख्या में छात्राओं की सहभागिता

    कार्यक्रम में डॉ. गिर्राजप्रसाद जोनवाल, डॉ. भूरसिंह गुर्जर, मानसिंह मीणा सहित महाविद्यालय का समस्त संकाय उपस्थित रहा। साथ ही कल्पना मीणा, निकिता खंगार, रानी राजावत, शिवानी चतुर्वेदी, खुशबू मीणा, काजल जांगिड़, राधा सैनी, नेहा बैरवा, शिवानी मित्तल, काजल कुमारी बैरवा सहित बड़ी संख्या में छात्राओं ने कार्यक्रम में सहभागिता की।

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