
उमेश जोशी, देश के ख्यातनाम पत्रकार है जिन्होंने 21 वर्षों की प्रिंट मीडिया,
30 वर्ष टीवी,और 16 वर्ष रेडियो में काम किया। विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर उनका यह लेख सभी पाठकों को समर्पित है।
आज 3 मई, रविवार—आज का दिन मेरे लिए सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। मैं एक पत्रकार हूँ… और आज विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस है।
हर वर्ष 3 मई को मनाया जाने वाला यह दिवस, 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा घोषित किया गया। इसकी जड़ें 1991 की ऐतिहासिक विंडहोक घोषणा में हैं जिसने दुनिया को यह बताया कि एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और बहुलतावादी मीडिया ही किसी समाज की सच्ची आवाज़ होता है।
यह दिन हमें याद दिलाता है कि प्रेस की स्वतंत्रता कोई विशेषाधिकार नहीं। यह लोकतंत्र की सांस है, जनता का अधिकार है, और सच्चाई की सबसे बड़ी ढाल है।
इस वर्ष 2026 का थीम है:
“शांतिपूर्ण भविष्य का निर्माण: सत्य, स्वतंत्रता और डिजिटल युग में जवाबदेही के साथ।”
डिजिटल युग में, जहाँ खबरें सेकंडों में बनती और बिगड़ती हैं, वहाँ पत्रकारिता की असली कसौटी और भी कठिन हो गई है।आज जरूरत है। सत्य की, संतुलन की, और जनहित के प्रति अडिग प्रतिबद्धता की।
और इत्तेफाक देखिए…
आज ही विश्व हास्य दिवस भी है। मई के पहले रविवार को मनाया जाने वाला यह दिन।
अब ज़रा सोचिए…
एक तरफ प्रेस की स्वतंत्रता,
दूसरी तरफ हँसी का दिन।
तो मैंने आज “प्रेस स्वतंत्रता” पर दिल खोलकर हँस लिया…
आप भी हँस सकते हैं यदि आप इसके मायने समझते हैं।
मेरा अनुभव कहता है—
जैसे ही ‘प्रेस स्वतंत्रता’ की सच्चाई समझ में आती है,
हास्य योग करने की ज़रूरत नहीं पड़ती…
हँसी अपने आप फूट पड़ती है । कभी व्यंग्य में, कभी विवशता में।
अब व्यंग्य से हटकर फिर गंभीरता की ओर लौटता हूँ…
एक पत्रकार के रूप में मेरी यात्रा—
21 वर्षों की प्रिंट मीडिया,
करीब 30 वर्ष टीवी,
और 16 वर्ष रेडियो।
इस लंबे सफर में मैंने अभिव्यक्ति की शक्ति को जिया है, महसूस किया है।
और गर्व से कह सकता हूँ कि प्रिंट मीडिया के उन 21 वर्षों में—
मेरे 21 शब्द भी सेंसर नहीं हुए।
यह मेरे लिए सौभाग्य था…
और इसका श्रेय मैं आदरणीय प्रभाष जोशी जी को कोटि-कोटि नमन करते हुए देता हूँ, जिन्होंने पत्रकारिता में स्वतंत्रता की वह परंपरा जीवित रखी, जो आज कहीं खोती सी नजर आती है।
हम “जनसत्ता” के उस दौर के साथी—
वास्तव में सौभाग्यशाली थे, जिन्होंने
प्रेस स्वतंत्रता को सिर्फ पढ़ा नहीं, जिया है।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ,
तो लगता है। वह स्वतंत्रता अब वास्तविकता से ज्यादा कल्पना बनती जा रही है।
और अजीब बात यह है कि
अब तो वह कल्पना में आने से भी डरती है…
याद रखिए—
प्रेस की स्वतंत्रता केवल अधिकार नहीं,
यह लोकतंत्र की आत्मा है,
और जनविश्वास की नींव है।
आइए, इस दिन हम सब मिलकर संकल्प लें—
सत्य के साथ खड़े रहने का,
निष्पक्षता को निभाने का,
और निर्भीकता से सच कहने का।
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