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    Homeधर्म-समाजसत्ता,संपति ओर पद प्रतिष्ठा का कभी नहीं करे अभिमान-आचार्य रामदयालजी महाराज

    सत्ता,संपति ओर पद प्रतिष्ठा का कभी नहीं करे अभिमान-आचार्य रामदयालजी महाराज

    रामद्वारा में श्रीमद् भागवत ज्ञान सप्ताह एवं 108 मूल भागवत का पाठ रविवार से

    भीलवाड़ा। हम शास्त्रों की बाते तो करते है लेकिन व्यवहार में उसकी पालना नहीं करते ओर जो हमे अच्छा लगता वहीं स्वीकार करते है। अपनी-अपनी चाल सब चले पर अपनों के साथ कोई चाल नहीं चले बल्कि अपनों के साथ चले। साथ चलना दक्षता ओर चतुराई होती है ओर चाल चलना चालाकी है।

    ये विचार अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाघीश्वर जगतगुरू आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने ‘‘विश्व शांति कल्याण’’ चातुर्मास के तहत शुक्रवार को दैनिक सत्संग में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि चालबाजियों के कारण ही दुनिया में किस पर विश्वास करे यह तय कर पाना कठिन होता जा रहा है।

    युग का प्रभाव है कि सारी सम्पन्नता के बावजूद सारा जगत भयावह है। भय रहित केवल भक्ति है। सत्ता,संपति,सौन्दर्य, पद प्रतिष्ठा कुछ भी पाकर इतराना नहीं चाहिए क्योंकि ये आज आपके पास कल किसी ओर के पास होंगे। इनका समाज व राष्ट्र के लिए कैसे सदुपयोग कर सकते यहीं दक्षता होती है।

    आचार्यश्री ने कहा कि गुण व आचरण से ही तय होता है कि सतयुग जैसा नजारा है या कलयुग चल रहा है। सतयुग अर्न्तमुखी ओर कलयुग बर्हिमुखी बनाता है। राम गुरू कृपा करे ओर हम अर्न्तमुखी बनकर परमात्मा को देखने का प्रयास करे। राम धर्म की पालना करे बेड़ा पार हो जाएगा। आत्म धर्म कल्याणकारी ओर शरीर व संसार का धर्म बहुत नुकसान देने वाला होता है। हम सभी अपने-अपने इष्ट धर्म का पालन करे।

    उन्होंने कहा कि जगत में कागज काम करता है लेकिन परमात्मा की तरफ जाने के लिए मजबूत दिल चाहिए। आराध्य के प्रति मन के भाव मजबूत रहे तो कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। परमात्मा के भक्त प्रहलाद, मीरा, ध्रुव कोई भी हो उन्हें पग-पग पर परीक्षा देनी पड़ती है।

    आचार्य रामदयाल महाराज ने कहा कि हमारा आचरण तय करता है कि युग कैसा है। हम अगर धर्म ध्यान,राम का ध्यान, कर्तव्य का ध्यान ओर आत्मचिंतन करते है तो सतयुग है। गुरू गोविन्द की अर्चना करते है तो त्रेता युग है ओर अज्ञानता के कारण धर्म से विरक्त हो जाए तो कलयुग है। हर युग का असर स्वभाव पर आता है। जहां शांति व धैर्य होता वह सतयुग ओर जहां क्रोध होता है वह कलयुग होता है। सतयुग को धर्म युग कहा जाता है।

    धर्म के अनुसार इंसान व जगत चलता था। ये कलयुग है, जमाने के अनुसार धर्म को चलना पड़ रहा है। किसी भी युग में किसी भी पल राम नाम लो वह पुण्यदायी ही होगा। राम केवल नाम नहीं हमारी संस्कृति का मूल तत्व है।

    आचार्य रामदयाल महाराज ने कहा कि विक्रम संवत 1817 में रामस्नेही सम्प्रदाय की सृजनकर्ता भीलवाड़ा की पावनधरा पर रामद्वारा में ‘‘विश्व शांति कल्याण’’ चातुर्मास के तहत विश्व शांति एवं कल्याण की भावना से 13 से 20 सितम्बर तक विराट श्रीमद् भागवत ज्ञान सप्ताह का आयोजन होगा। इसमें भागवत भक्ति, भक्त व भगवान पर चर्चा एवं जीवन दर्शन पर प्रवचन होंगे। इस दौरान 108 भागवत मूल पाठ का एतिहासिक आयोजन भी होगा।

    पुष्कर से आने वाले 108 वेद पाठी विद्धान पंडित भागवत का मूल पाठ करेंगे। इन 108 भागवत का पूजन 108 यजमान परिवार करेंगे। इस सप्ताह में प्रतिदिन सुबह 8.30 से 10.30 बजे तक एवं दोपहर 2 से 4 बजे तक श्रीमद् भागवत कथा एवं सुबह 10.30 बजे से 11.30 बजे तक एवं शाम को 4 से 5 बजे तक श्रीवाणीजी का प्रवचन होगा।

    वाणीजी का प्रवचन आचार्य श्री रामदयालजी महाराज के मुखारबिंद से होगा। श्रीमद् भागवत कथा का वाचन संत मनोरथराम रामजी राम मचलाना द्वारा किया जाएगा। इस आयोजन में शामिल होने के लिए देश के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु भीलवाड़ा आएंगे।

    आचार्यश्री से पूर्व अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस प्रवचन दिया। प्रवचन के विश्राम पर श्रद्धालुओं द्वारा आचार्यश्री रामदयालजी महाराज की आरती की गई। सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। सूर्यास्त के समय संध्या आरती एवं रामस्नेही सम्प्रदाय के युवा संत रामजस ईडर द्वारा भक्तमाल की कथा में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे है।

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