नदी-पहाड़ बचाव सम्मेलन और जनसंकल्प
कर्नाटक । 29 मार्च 2026 को बंगरामक्की, कर्नाटक में आयोजित नदी-पहाड़ बचाव सम्मेलन में शेरावती नदी पर प्रस्तावित आठवें बांध को रोकने के लिए जनसंकल्प लिया गया। यहां के लोगों ने स्पष्ट रूप से अपनी भावना व्यक्त की कि वे इस पर्वतमाला और नदी को सुरक्षित रखना चाहते हैं तथा किसी भी नए बांध के निर्माण के पक्ष में नहीं हैं। ग्रामीणों का मानना है कि शेरावती नदी अपने उद्गम से लेकर संगम तक स्वच्छ और अविरल रूप से बहती रहे, यही उनकी प्राथमिकता है। इसके विपरीत, केंद्र सरकार द्वारा इस नदी पर एक और बड़ा बांध बनाने की योजना बनाई गई है, जिससे स्थानीय लोगों में गहरी चिंता उत्पन्न हुई।
विस्थापन और जंगलों में बिखरी बसाहट
इस क्षेत्र में निवास करने वाले लोग पहले भी कई बार विस्थापन का दर्द झेल चुके हैं और बार-बार अपनी बसाहट बदलने के लिए मजबूर हुए हैं। क्षेत्र भ्रमण के दौरान यह देखा गया कि घने जंगलों में कई किलोमीटर की दूरी पर छोटे-छोटे समूहों में परिवार बसे हुए हैं। कहीं दो परिवार 10 किलोमीटर दूर, तो कहीं तीन परिवार 15 किलोमीटर दूर निवास करते हैं।
वन संसाधनों का दोहन और प्रशासनिक उदासीनता
इन दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंचने के लिए रास्ते बनाए गए हैं, जो औपचारिक रूप से वन विभाग द्वारा निगरानी के उद्देश्य से बनाए गए हैं। हालांकि, इन्हीं रास्तों का उपयोग बड़े पैमाने पर वनोंपज के परिवहन के लिए भी किया जा रहा है, जिससे जंगलों के दोहन की स्थिति स्पष्ट रूप से सामने आती है। जंगलों से सुपारी जैसे उत्पादों से भरे ट्रक नियमित रूप से बाहर जाते देखे गए, जो प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक उपयोग की ओर संकेत करते हैं।
40 किलो मीटर की यात्रा के दौरान एक भी वन अधिकारी दिखाई नहीं दिया। वन क्षेत्रों में भूमि सर्वेक्षण कर सीमांकन के लिए लगाए गए चिह्नों के बावजूद, वहां अतिक्रमण की स्थिति भी देखने को मिली। कई स्थानों पर लोगों ने वन भूमि पर अपने कब्जे स्थापित कर लिए हैं, जबकि इन गतिविधियों को रोकने के लिए संबंधित अधिकारियों की सक्रियता नगण्य दिखाई देती है।
विकास के नाम पर बढ़ता विनाश
वन भूमि पर नए मकानों का निर्माण, विकास के नाम पर चल रही परियोजनाएं, सड़कों का विस्तार और जल आपूर्ति से जुड़ी योजनाएं, ये सभी मिलकर जंगलों के विनाश को बढ़ावा दे रही हैं। यह विडंबना है कि जिस विकास को प्रगति का प्रतीक माना जाता है, वही यहां के पर्यावरण और प्राकृतिक संतुलन के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है।
जनआंदोलन और स्थानीय विरोध
इन परिस्थितियों के बीच स्थानीय लोगों ने अपनी आवाज बुलंद की है और सम्मेलन के माध्यम से सामूहिक रूप से यह घोषणा की कि वे किसी भी स्थिति में इस बांध का निर्माण नहीं होने देंगे। एक स्थानीय पुजारी, मारुति गुरु, ने तो यहां तक कहा कि यह मेरे शरीर पर बनेगा, यह बांध उनके जीवित रहते नहीं बन सकता। उनके इस दृढ़ संकल्प ने जनआंदोलन को और अधिक मजबूती प्रदान की।
परिणामस्वरूप, सरकार को इस परियोजना पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य होना पड़ा और अंततः इस योजना से पीछे हटने का निर्णय लिया गया है।
पूरे देश में पर्वतमालाओं पर खतरा
अब पूरे भारत की पर्वतीय मालाओं में विकास के नाम पर अत्यंत तीव्र गति से विनाश हो रहा है, जो एक गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। इस बढ़ते हुए विनाश को रोकने के लिए सशक्त और प्रभावी कानूनों की आवश्यकता स्पष्ट रूप से महसूस की जा रही है।
यदि समय रहते ऐसे कानून नहीं बनाए गए और उनका कड़ाई से पालन नहीं किया गया, तो अरावली पर्वतमाला, हिमालय, पश्चिमी घाट तथा देश की अन्य पर्वतमालाओं का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है और हम इस विनाश को अपनी आंखों के सामने घटित होते हुए देखेंगे।
अनुभवों से उभरती गंभीर तस्वीर
पिछले कई दशकों के अनुभव इस स्थिति की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं। अरावली पर्वतमाला में पिछले 50 से अधिक वर्षों से निरंतर हो रहे विनाश को प्रत्यक्ष रूप से देखा गया है।
इसी प्रकार, हिमालय क्षेत्र में भी लगभग 40 वर्षों से निरंतर संपर्क और यात्राओं के दौरान यह महसूस किया गया है कि पिछले 10 से 15 वर्षों में विकास कार्यों की तेज गति ने इस संवेदनशील क्षेत्र को गहराई से प्रभावित किया है। सड़कों के विस्तार, बड़े निर्माण कार्यों और अन्य परियोजनाओं के कारण हिमालय की स्थिरता प्रभावित हो रही है। ऐसा प्रतीत होता है मानो यह पर्वतमाला लगातार कंपन झेल रही हो और एक प्रकार से बीमार या असंतुलित स्थिति में पहुंच गई हो।
पश्चिमी घाट यात्रा और जमीनी सच्चाई
इसी संदर्भ में पश्चिमी घाट क्षेत्र की यात्राएं भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही हैं। हाल ही में 26 से 29 तारीख तक की यात्रा के दौरान विभिन्न क्षेत्रों—अल्लाहपुर से अंकोला, गोकर्ण, कोडकणी, नोडकुली, कुमटा और खडकरणी—का दौरा किया गया। इस दौरान स्थानीय लोगों के साथ संवाद स्थापित हुआ और यह समझने का अवसर मिला कि वहां भी विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर बांधों की श्रृंखला बनाई जा रही है, जिसका स्थानीय समुदायों द्वारा विरोध किया जा रहा है।
इस यात्रा के दौरान बंगरामक्की में आयोजित सम्मेलन में भी भाग लिया गया, जहां लोगों ने एकजुट होकर इन परियोजनाओं के खिलाफ अपनी आवाज उठाई।
सरकारों की भूमिका और पर्यावरणीय संकट
इस पूरे अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि केंद्र और राज्य सरकारें, भले ही प्रशासनिक रूप से अलग हों, लेकिन विकास परियोजनाओं के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में एक साथ सक्रिय दिखाई देती हैं। इन परियोजनाओं के कारण पश्चिमी घाट जैसे समृद्ध और जैव-विविधता से भरपूर क्षेत्र की प्राकृतिक संरचना पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो रहा है।
यह स्थिति केवल पर्यावरणीय संकट ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।
संतुलन ही समाधान
इसलिए अब समय आ गया है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए, स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए और दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाया जाए। तभी हम इन पर्वतमालाओं को विनाश से बचाकर उनके अस्तित्व को सुरक्षित रख सकते हैं।
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