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    सांस्कृतिक स्वायत्तता पर दौलत वैद का स्पष्ट दृष्टिकोण

    सांस्कृतिक संस्थाओं के पुनर्गठन पर पहचान और स्वायत्तता बचाने की जोरदार पैरवी

    दौलत वैद-
    वरिष्ठ रंगमंच निर्देशक एवं डिज़ाइनर
    संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार विजेता

    सांस्कृतिक संस्थाओं की स्वायत्तता और पहचान पर मैं, दौलत वैद, यह स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ कि वर्तमान समय में कला और संस्कृति से जुड़ी संस्थाओं के पुनर्गठन की जो चर्चाएँ सामने आ रही हैं, वे केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं हैं—उनके भीतर एक गहरी संरचनात्मक दिशा छिपी हुई है।

    ऐसा प्रतीत होता है कि यह प्रक्रिया धीरे-धीरे सांस्कृतिक संस्थाओं को स्वायत्तता से हटाकर एक केंद्रीकृत नियंत्रण की ओर ले जा रही है—जहाँ रचनात्मकता के स्थान पर प्रशासन, और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के स्थान पर अनुमोदन (approval) प्रमुख हो जाएगा।

    और यहीं से एक नई समस्या जन्म लेती है— जब सृजन के केंद्र में कलाकार नहीं, बल्कि ब्यूरोक्रेसी आ जाती है, तो कला “निर्देशों” में सिमट जाती है, और पहचान “फाइलों” में खो जाती है। यह सत्य है कि कई संस्थाओं के बीच समन्वय का अभाव रहा है, और कभी-कभी वे इवेंट मैनेजमेंट तक सीमित होती दिखती हैं। परंतु समाधान यह नहीं हो सकता कि उनकी स्वायत्तता समाप्त कर दी जाए, या उन्हें एक ही प्रशासनिक ढाँचे में बाँध दिया जाए।

    हमें यह समझना होगा कि: National School of Drama (NSD) केवल एक संस्थान नहीं, बल्कि भारतीय रंगमंच की जीवंत आत्मा है। Film and Television Institute of India (FTII) दृश्य कथ्य और सिनेमा का संवाहक है
    Sahitya Akademi भाषाओं और साहित्यिक चेतना की प्रतिनिधि है। Lalit Kala Akademi दृश्य कलाओं की परंपरा और प्रयोगशीलता का केंद्र है। Indira Gandhi National Centre for the Arts (IGNCA) शोध, विमर्श और सांस्कृतिक दस्तावेज़ीकरण का आधार है। National Gallery of Modern Art (NGMA) आधुनिक कला की स्मृति और प्रस्तुति का स्थल है।

    इन सभी संस्थाओं का स्वरूप, उद्देश्य और आत्मा अलग-अलग है। इन्हें एक समान दृष्टि से देखना या एक ही ढाँचे में समेटना—विविधता को व्यवस्था में बदलना नहीं, बल्कि व्यवस्था के नाम पर विविधता को समाप्त करना होगा। पुनर्गठन की आवश्यकता से इंकार नहीं किया जा सकता— परंतु उसका उद्देश्य “नियंत्रण” नहीं, बल्कि “सहयोग” होना चाहिए।
    सरकार की भूमिका एक संरक्षक (facilitator) की होनी चाहिए— न कि एक नियंत्रक (controller) की।

    दिशा दी जा सकती है, संवाद स्थापित किया जा सकता है, लेकिन सृजन की आत्मा को निर्देशों में बाँधना— संस्कृति को जीवित रखने का मार्ग नहीं हो सकता। भारत की सांस्कृतिक शक्ति उसकी विविधता में निहित है— और यही विविधता इन संस्थाओं की आत्मा में भी बसती है। यदि हम इनकी पहचान को मिटा देंगे, तो हम केवल संस्थाएँ नहीं खोएँगे— हम अपनी सांस्कृतिक चेतना की जड़ों को कमजोर कर देंगे।

    अतः मेरा स्पष्ट मत है: हर संस्था की अपनी स्वतंत्र पहचान बनी रहनी चाहिए, और किसी भी प्रकार का पुनर्गठन— स्वायत्तता को सुरक्षित रखते हुए ही किया जाना चाहिए।

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