शिवभक्ति के बीच सावन में तेज हुई सियासी हलचल, टिकट के लिए दौड़ रहे दावेदार
किशनगढ़बास। सावन का महीना, मंदिरों में गूंजते मंत्र और दूसरी ओर चुनावी हलचल। खैरथल और किशनगढ़बास में इन दिनों कुछ ऐसा ही नजारा दिखाई दे रहा है। एक ओर भगवान शिव के मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है तो दूसरी ओर राजनीतिक दलों के दफ्तरों और नेताओं के आवासों पर टिकट के दावेदारों की लंबी कतारें लगी हुई हैं। पंचायत और निकाय चुनावों की आहट के साथ ही पूरे क्षेत्र में सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं।

लंबे समय बाद गांव और शहर की सरकार चुनने का अवसर मिलने जा रहा है। ऐसे में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल पूरी ताकत के साथ चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में जुट गए हैं। गांव-गांव और वार्ड-वार्ड में बैठकें आयोजित की जा रही हैं। कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया जा रहा है और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने के प्रयास तेज हो गए हैं।
इस बार किशनगढ़बास विधायक दीपचंद खेरिया की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी हुई है। पिछले दो कार्यकाल में किशनगढ़बास और खैरथल क्षेत्र में भाजपा समर्थित बोर्ड का गठन हुआ था, जिसका श्रेय पूर्व विधायक रामहेत यादव को दिया जाता रहा है। ऐसे में कांग्रेस इस बार समीकरण बदलने की कोशिश कर रही है, जबकि भाजपा अपने मजबूत जनाधार को बरकरार रखने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है।

इन दिनों नेताओं के घरों, पार्टी कार्यालयों और चौपालों पर राजनीतिक गतिविधियां बढ़ गई हैं। टिकट के दावेदार अपने समर्थकों के साथ पहुंच रहे हैं और अपनी दावेदारी मजबूत करने के लिए जनसमर्थन का हवाला दे रहे हैं। कोई माला और साफा लेकर पहुंच रहा है तो कोई अपने पक्ष में सर्वे रिपोर्ट और समर्थकों की सूची प्रस्तुत कर रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार चुनाव में केवल नारों से काम नहीं चलेगा। जनता स्थानीय मुद्दों के आधार पर अपना फैसला सुनाएगी। सड़कों की स्थिति, पेयजल व्यवस्था, सफाई व्यवस्था, भ्रष्टाचार और विकास कार्य जैसे मुद्दे इस चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
खैरथल में जिला मुख्यालय को लेकर चल रहे आंदोलन का मुद्दा भी चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकता है। कांग्रेस इसे भाजपा सरकार के खिलाफ एक बड़े मुद्दे के रूप में सामने ला सकती है। वहीं, भाजपा प्रदेश और केंद्र सरकार की उपलब्धियों को जनता के बीच लेकर जा रही है।
क्षेत्र के लोगों की नजर अब इस बात पर टिकी हुई है कि पिछले दस वर्षों में हुए विकास कार्यों के आधार पर जनता किसे अपना समर्थन देती है। राजनीतिक दल भी अपने-अपने स्तर पर जनता के बीच जाकर उपलब्धियों और कमियों का आकलन कर रहे हैं।
सावन के इस पवित्र महीने में जहां श्रद्धालु भगवान शिव से सुख-समृद्धि की कामना कर रहे हैं, वहीं राजनीतिक दल भी जनता के समर्थन और जीत के लिए रणनीति बनाने में जुटे हुए हैं। अब देखना यह होगा कि गांव और शहर की सत्ता की चाबी किसके हाथ लगती है।
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