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    सेवानिवृत्ति के बाद रिश्तों की खामोशी क्यों

    सेवानिवृत्ति का अर्थ यह तो नहीं कि संबंधों की भी सेवानिवृत्ति हो जाए। बैंक ने हमें जो अपनापन दिया, क्या वह केवल नौकरी तक सीमित था? या वह एक ऐसा बंधन था जिसे हमें जीवनभर संजोकर रखना चाहिए? शायद अब समय है कि हम इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार करें।

    मिशन सच के लिए अलवर से संदीप शर्मा 

    किसी अपने को खोने का दर्द शब्दों में बयान करना आसान नहीं होता। यह ऐसा घाव है जो बाहर से दिखाई नहीं देता, पर भीतर ही भीतर मनुष्य को तोड़ देता है। चेहरे पर सामान्यता का आवरण ओढ़ लेना शायद सामाजिक मजबूरी हो, पर सच्चाई यह है कि जिसकी कमी जीवन में उतर जाती है, उसकी गैरमौजूदगी हर दिन, हर क्षण महसूस होती रहती है। स्मृतियाँ पीछा नहीं छोड़तीं। कभी मुस्कान बनकर, तो कभी चुपचाप आँखें भिगोकर।

    किसी प्रिय व्यक्ति का जीवन से जाना बेहद दुखदायी होता है। वह चाहे परिवार का सदस्य हो, मित्र हो या वर्षों साथ काम करने वाला सहकर्मी। उसके साथ बिताए हुए पल और उसकी दी हुई खुशियाँ हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती हैं। समय आगे बढ़ता है, पर यादें वहीं ठहरी रहती हैं। सेवानिवृत्त बैंककर्मियों का जीवन भी कुछ ऐसा ही होता है। हममें से अधिकतर एक-दूसरे को बहुत गहराई से नहीं जानते, पर हमें जोड़ने वाला सेतु हमारा बैंक रहा है। वही बैंक, जिसने दशकों तक हमें एक परिवार की तरह बाँधे रखा। सुख-दुख, लक्ष्य-चुनौतियाँ, ट्रांसफर और प्रमोशन—सब साझा रहे।

    पिछले दिनों हमारे ही एक साथी हरिमोहन गुप्ता  के निधन का समाचार मिला। बताया गया कि वे पिछले छह माह से अस्वस्थ थे। इससे उबर भी नहीं पाए थे कि 13 तारीख को  कृष्ण कांत खंडेलवाल जी भी ईश्वर के चरणों में चले गए। वे भी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। एक के बाद एक ऐसे समाचार मन को भीतर तक हिला देते हैं। लगता है जैसे जीवन की एक और कड़ी टूट गई हो।

    श्री खंडेलवाल जी लगभग पाँच वर्ष पूर्व हमारे स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त हुए थे। उनका संबंध पूर्ववर्ती एसबीबीजे से रहा। शांत स्वभाव के, कम बोलने वाले, पर अत्यंत सरल व्यक्तित्व के धनी थे। अलवर निवासी होने के कारण वे कभी-कभी अलवर बस स्टैंड शाखा में आ जाते थे, तब उनसे मुलाकात हो जाती थी। छोटी-सी बातचीत भी आत्मीय लगती थी। मानो बैंक की पुरानी दीवारें फिर से हमारे चारों ओर खड़ी हो गई हों। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे बैंक से जुड़े रहे, पर धीरे-धीरे वह संपर्क भी विरल होता गया।

    कल महाशिवरात्रि का पावन पर्व था। संयोग से मेरी वैवाहिक वर्षगाँठ भी थी। बधाइयों के संदेश लगातार आते रहे, पर मन के किसी कोने में एक पीड़ा बनी रही। यह पीड़ा केवल दो साथियों के जाने की नहीं थी, बल्कि उस खालीपन की थी जो सेवानिवृत्ति के बाद हमारे जीवन में चुपचाप उतर आता है। हम जो वर्षों तक प्रतिदिन मिलते थे, अचानक एक-दूसरे से दूर क्यों हो जाते हैं? क्यों सेवानिवृत्ति के बाद हमारा मिलना-जुलना धीरे-धीरे कम हो जाता है?

    क्या यह व्यस्तताओं का बहाना है, या उम्र के साथ बढ़ती झिझक? क्यों हम अपनी बीमारियों, चिंताओं और उलझनों को एक-दूसरे से साझा नहीं करते? यदि हमें पता होता कि कोई साथी लंबे समय से अस्वस्थ है, तो शायद हम समय निकालकर उससे मिलने जाते, उसका मनोबल बढ़ाते। कभी-कभी केवल एक मुलाकात, एक फोन कॉल, या एक आत्मीय संदेश भी जीवन में आशा की किरण जगा देता है।

    सेवानिवृत्ति का अर्थ यह तो नहीं कि संबंधों की भी सेवानिवृत्ति हो जाए। बैंक ने हमें जो अपनापन दिया, क्या वह केवल नौकरी तक सीमित था? या वह एक ऐसा बंधन था जिसे हमें जीवनभर संजोकर रखना चाहिए? शायद अब समय है कि हम इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार करें।

    जीवन अनिश्चित है, पर संबंधों को जीवित रखना हमारे हाथ में है। आइए, हम यह संकल्प लें कि सेवानिवृत्ति के बाद भी संवाद की डोर को कमजोर नहीं होने देंगे। मिलना-जुलना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि भावनात्मक आवश्यकता है। क्योंकि जब कोई अपना चला जाता है, तब सबसे अधिक खलता है—वह समय, जो हम साथ बिता सकते थे, पर बिता नहीं पाए।

    सेवानिवृति के बाद क्या करें –

    यूं तो सभी लोग अपने हिसाब से कुछ ना कुछ करते ही रहते है पर कुछ सुझाव है जिन पर आवश्यकता एंव परिस्थितिके अनुसार अमल किया जा सकता है-

    साप्ताहिक मिलन एवं चाय चर्चा: सेवानिवृत्ति के बाद आपसी जुड़ाव बनाए रखने के लिए सप्ताह में एक दिन पार्क या सामुदायिक भवन में मिलना अत्यंत उपयोगी रहता है। हल्की चाय चर्चा, समसामयिक विषयों पर विचार-विमर्श, जन्मदिन या वर्षगांठ का सामूहिक उत्सव तथा पुस्तक चर्चा जैसी गतिविधियाँ न केवल मानसिक सक्रियता बनाए रखती हैं, बल्कि पुराने मित्रों के साथ आत्मीय संबंध भी मजबूत करती हैं।

    स्वास्थ्य, योग एवं सामाजिक सेवा गतिविधियाँ: नियमित प्रातः भ्रमण, योग-प्राणायाम, लाफ्टर क्लब और समय-समय पर स्वास्थ्य शिविर शरीर और मन को स्वस्थ रखते हैं। इसके साथ ही जरूरतमंद बच्चों को निःशुल्क पढ़ाना, युवाओं को मार्गदर्शन देना, पौधारोपण या अन्य सामाजिक कार्यों में सहभागिता जीवन को नया उद्देश्य और संतोष प्रदान करती है।

    सांस्कृतिक, मनोरंजन एवं यात्रा कार्यक्रम: कविता गोष्ठी, भजन संध्या, खेल प्रतियोगिताएँ, त्योहारों का सामूहिक आयोजन तथा समय-समय पर पिकनिक या तीर्थ-यात्रा जैसे कार्यक्रम समूह में उत्साह और ऊर्जा का संचार करते हैं। इन गतिविधियों से न केवल एक-दूसरे से निरंतर संपर्क बना रहता है, बल्कि सेवानिवृत्ति का समय सक्रिय, आनंदमय और सार्थक बन जाता है।

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