टहला : आध्यात्मिक विरासत से समृद्ध भूमि
डा. अभिमन्यु सिद्ध
राजस्थान के अलवर जिले का ऐतिहासिक ग्राम टहला केवल अपने प्राकृतिक सौंदर्य, पर्वतीय परिवेश और ग्रामीण संस्कृति के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यह भूमि स्वामी विवेकानंद जी के ऐतिहासिक प्रवास के कारण भी विशेष महत्व रखती है। यह वही धरती है जहाँ उनके विचारों और साधना की गूंज आज भी वातावरण में अनुभव की जा सकती है। टहला का नाम आते ही आध्यात्मिक चेतना, त्याग और मानव सेवा का भाव स्वतः स्मरण हो उठता है।

अखिल भारतीय भ्रमण और अलवर आगमन
स्वामी विवेकानंद जी अपने अखिल भारतीय भ्रमण के दौरान फरवरी 1891 में अलवर पहुँचे। लगभग एक माह के प्रवास के पश्चात 28 मार्च 1891 को उन्होंने अलवर के भक्तों से विदा ली। अलवर से अठारह मील दूर स्थित पाण्डुपोल की ओर प्रस्थान करते समय उनकी इच्छा पैदल यात्रा करने की थी, किंतु प्रखर सूर्यताप और मार्ग की कठिनाइयों को देखते हुए उनके मित्रों ने उन्हें ‘रथ’—एक प्रकार की ढँकी हुई बैलगाड़ी—में चलने का आग्रह किया, जिसे वे अस्वीकार नहीं कर सके।
भक्तों का अनुराग और स्वामीजी का स्नेह
स्वामी विवेकानंद जी के प्रति अलवर के भक्तों का अनुराग इतना गहरा था कि अनेक भक्त उनके साथ कम से कम पचास-साठ मील तक चलने की अनुमति माँगने लगे। स्वामीजी की इच्छा उन्हें आगे न ले जाने की थी, किंतु सबके भावनात्मक आग्रह को देखते हुए उन्होंने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। यह प्रसंग स्वामीजी के करुणामय और मानवीय स्वभाव को प्रकट करता है।
पाण्डुपोल से टहला तक की प्रेरक यात्रा
पाण्डुपोल पहुँचकर स्वामी विवेकानंद जी ने सभी साथियों सहित स्थानीय हनुमान मंदिर के प्रांगण में रात्रि विश्राम किया। अगले दिन सभी ने पैदल यात्रा करते हुए सोलह मील दूर स्थित टहला ग्राम की ओर प्रस्थान किया। यह मार्ग पर्वतीय, वनाच्छादित और जंगली पशुओं से युक्त था, किंतु स्वामीजी की गंभीर, रसिकतापूर्ण वाणी और सुमधुर संगीत ने यात्रा को आनंदमय बना दिया। कठिन पथ भी उनके सान्निध्य में सहज प्रतीत हुआ।
नीलकंठ महादेव मंदिर में दिव्य संवाद
टहला पहुँचकर स्वामी विवेकानंद जी ने नीलकंठ महादेव के प्राचीन मंदिर के समीप रात्रि विश्राम किया। विश्राम काल में उन्होंने समुद्र मंथन, देवासुर संग्राम, विष की उत्पत्ति और भगवान शिव द्वारा विषपान की कथा का अत्यंत गूढ़ और नवीन आध्यात्मिक अर्थ समझाया। उन्होंने माया रूपी संसार, इन्द्रियभोग और आत्मज्ञान के मार्ग को सरल शब्दों में स्पष्ट करते हुए बताया कि भोग जितना अधिक, विष उतना ही प्रबल होता है, जो आत्मोन्नति में बाधक बनता है।
मृत्युंजय महादेव और संन्यासी का आदर्श
स्वामीजी ने कहा कि ब्रह्मानंद में स्थित संन्यासी माया के इन्द्रजाल में नहीं फँसते, बल्कि देवाधिदेव महादेव की भाँति संसार की रक्षा करते हैं। वे अपने त्याग और तप से मृत्यु के भय पर विजय प्राप्त कर लेते हैं और दूसरों को भी मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं। यह कहकर स्वामी विवेकानंद जी मृत्युंजय महादेव के सम्मुख ध्यानमग्न हो गए।
नारायणी देवीस्थान और विदाई का क्षण
अगले दिन प्रातःकाल यात्रा पुनः आरंभ हुई और अठारह मील दूर स्थित नारायणी देवीस्थान पर समाप्त हुई। यहाँ प्रतिवर्ष विशाल मेला लगता है, जिसमें राजस्थान के विभिन्न अंचलों से श्रद्धालु आते हैं। एक रात्रि विश्राम के पश्चात स्वामीजी ने अपने साथियों से विदा ली और अकेले सोलह मील की यात्रा कर बसवा रेलवे स्टेशन पहुँचे, जहाँ से वे जयपुर के लिए रवाना हुए।
टहला प्रवास की शाश्वत प्रेरणा
स्वामी विवेकानंद जी के टहला प्रवास ने इस ग्राम की भूमि को आध्यात्मिक रूप से पावन बना दिया। यहाँ उन्होंने यह संदेश दिया कि मनुष्य को इन्द्रियभोग से दूर रहकर मानव कल्याण और सेवा के कार्यों में स्वयं को समर्पित करना चाहिए। टहला का वातावरण आज भी स्वामीजी के विचारों से अनुप्राणित प्रतीत होता है।
युवाओं के लिए संदेश
आज आवश्यकता है कि युवा वर्ग स्वामी विवेकानंद जी के टहला प्रवास से प्रेरणा लेकर आत्मसंयम, सेवा, त्याग और राष्ट्रनिर्माण के मार्ग पर आगे बढ़े। यही इस पावन भूमि की सच्ची श्रद्धांजलि और स्वामीजी के विचारों का जीवंत स्वरूप होगा।
(सोर्स – रामकृष्ण मठ नागपुर द्वारा प्रकाशित पुस्तक विवेकानंद प्रथम खंड लेखक स्वामी गम्भीरानंद , अनुवादक डॉ. केदारनाथ)
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