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    12वें लोक उत्सव के दूसरे दिन संविधान, संस्कृति और सामूहिकता का संगम

    उत्सव की बेयरफुट कॉलेज तिलोनिया में प्रस्तावना वाचन से शुरुआत, अजमेर के सोफिया कॉलेज में उत्तर–दक्षिण संगीत संगम

    अजमेर। 12वें लोक उत्सव के दूसरे दिन तिलोनिया स्थित बेयरफुट कॉलेज में संस्कृति, संविधान और सामूहिकता का सशक्त संगम देखने को मिला। कार्यक्रम की शुरुआत भारतीय संविधान की प्रस्तावना के सामूहिक वाचन से हुई, जिसने पूरे आयोजन को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों से जोड़ दिया।

    सभा को संबोधित करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय ने खमायती संगीत और उससे जुड़े समुदायों की परंपराओं पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि संगीत केवल कला नहीं, बल्कि श्रम, भक्ति, उत्सव और संघर्ष की अभिव्यक्ति है। “संगीत का कोई धर्म नहीं होता। भारत हम सबका है—हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई—और संगीत हमें एक सूत्र में बांधता है,” उन्होंने कहा।

    उन्होंने लोककला मर्मज्ञ कोमल कोठारी के योगदान को स्मरण करते हुए बताया कि किस प्रकार उन्होंने राजस्थान की लोक परंपराओं को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    लोक वाद्य और मरुस्थल की गूंज

    दूसरे दिन सरंगी और कमायचा जैसे पारंपरिक वाद्यों का परिचय कराया गया। सरंगी की मानवीय स्वर जैसी गूंज और कमायचा की गहरी लय ने श्रोताओं को लोक संगीत की आत्मा से परिचित कराया। लंगा गायकों ने प्रेम, आस्था और रोजमर्रा के जीवन से जुड़े गीत प्रस्तुत किए।

    कुलदीप कोठारी ने बाजरे के सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह केवल अनाज नहीं, बल्कि साझा अस्तित्व का प्रतीक है। लंगा कलाकारों ने बाजरा और जीरा पर आधारित विशेष गीत प्रस्तुत कर साधारण जीवन को सांस्कृतिक उत्सव में बदल दिया।

    महिला स्वर की सामूहिक शक्ति भी आयोजन का प्रमुख आकर्षण रही। मेधा साही के ‘स्ट्रेंजर्स क्वायर’ ने लगभग सौ स्वरों के साथ “भेणा चेत सके तो चेत” गीत प्रस्तुत किया। शंकर सिंह ने महिला मेला के इतिहास को साझा करते हुए कहा कि महिलाएं लोक गीतों की सर्जक और संवाहक हैं।

    सोफिया कॉलेज, अजमेर में उत्तर–दक्षिण संगीत संगम

    उत्सव के अंतर्गत अजमेर के सोफिया कॉलेज में एक विशेष कार्यशाला आयोजित की गई, जिसने उत्तर और दक्षिण भारत की संगीत परंपराओं को साझा मंच पर प्रस्तुत किया।

    कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. ज्योति चंदेल द्वारा स्वागत से हुई। अरुणा रॉय ने उत्सव की अवधारणा साझा की, जबकि कलाकारों का परिचय शेफाली मार्टिन ने कराया।

    दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत की प्रतिष्ठित गायिका संगीता शिवकुमार ने कर्नाटक संगीत की प्रस्तुति दी। उनके साथ मृदंगम वादक अश्विनी श्रीनिवासन, वायलिन वादक हरिता नारायण और घाटम वादक सुमना चंद्रशेखर ने संगत की।

    राजस्थान की लोक परंपरा का प्रतिनिधित्व दरिया बाई, हनीफा बाई, मांड़ गायिका मांगी बाई, कमायचा वादक घेवर खान मांगणियार तथा ढोलक वादक कुतला खान मांगणियार ने किया।

    जब कर्नाटक संगीत की जटिल राग संरचना और राजस्थान के लोक संगीत की सहजता एक साथ गूंजी, तो यह संगम विविधता में एकता का जीवंत प्रतीक बन गया।

    इस वर्ष के लोक उत्सव की विशेष पहचान महिला कलाकारों की बड़ी भागीदारी रही, जिसने लोक और शास्त्रीय परंपराओं के बीच सशक्त संवाद स्थापित किया।

    28 फरवरी को होंगे ये प्रमुख कार्यक्रम

    तीसरे दिन, 28 फरवरी को प्रातः 7 बजे अमानत (अम्मा का बगीचा) में सुप्रभातम् से कार्यक्रम की शुरुआत होगी। तुंगीनाथ एवं कालबेलिया महिला कलाकार फाग और होली के गीत प्रस्तुत करेंगी।

    प्रातः 9:30 बजे एम्फीथिएटर में बीन, मुरली, सुरनाई, शहनाई, मुरला और नरह जैसे वाद्यों की प्रस्तुतियां होंगी। सुरमंडल और सुरिंदा का वादन सिंधी सारंगी और कामायचा की संगत में किया जाएगा। चंग, डेरू और चकरी जैसे पारंपरिक नृत्य भी प्रस्तुत किए जाएंगे।

    दोपहर 3 बजे दलाई लामा हॉल में “परफॉर्मिंग समुदायों के अधिकार” विषय पर कार्यशाला आयोजित होगी, जिसमें निखिल डे, पारस बंजारा और शंकर सिंह विचार रखेंगे। विशेष अतिथि सोहेल हाशमी रहेंगे।

    सायं 6 बजे एम्फीथिएटर में “विरासत” प्रस्तुति के तहत लंगा और मांगणियार समुदाय की तीन पीढ़ियां पारंपरिक शैली में गायन करेंगी। इसके बाद “डायलॉग ऑफ द ड्रम्स” जुगलबंदी के साथ कार्यक्रम का समापन होगा।

    यह आयोजन बेयरफुट कॉलेज, खमायती, लोकतंत्रशाला एवं अमानत की ओर से किया जा रहा है।

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