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    200 साल पुरानी इमारत बनी चर्चा का विषय, कभी यहीं से चलती थी मध्य भारत की सरकार, अब पहली बार फहरा तिरंगा

    ग्वालियर। मध्य प्रदेश के स्थापना दिवस और वर्ष 1956 में इस प्रांत के गठन की गौरवशाली कहानी का मूल केंद्र ग्वालियर का ऐतिहासिक मोती महल रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जब 'मध्य भारत' राज्य का गठन किया गया था, तब उसकी प्रथम विधानसभा ग्वालियर के इसी मोती महल के भव्य दरबार हॉल में स्थापित की गई थी। इस ऐतिहासिक स्थल से वर्ष 1948 से 1956 के मध्य संपूर्ण मध्यभारत राज्य का विधिवत संचालन हुआ था। इतना ही नहीं, वर्ष 1955-56 के दौरान नए मध्य प्रदेश के उदय की पूरी रूपरेखा पर अंतिम मुहर भी इसी दरबार हॉल में स्थित मध्य भारत की तत्कालीन विधानसभा में ही लगाई गई थी।

    दो सौ वर्षों का समृद्ध इतिहास और मोती महल की भव्य संरचना

    ग्वालियर का यह प्रतिष्ठित मोती महल लगभग दो सौ वर्ष पुराना गौरवशाली इतिहास अपने भीतर समेटे हुए है। इस ऐतिहासिक महल का निर्माण कार्य वर्ष 1825 में महाराजा दौलतराव सिंधिया द्वारा प्रारंभ कराया गया था, जिसे बाद में वर्ष 1827 में जयाजीराव सिंधिया के काल में पूर्ण रूप दिया गया। अपने स्वर्णिम काल में इस विशाल परिसर के भीतर लगभग 900 से 1200 कमरे, 52 भव्य चौक और 9 विशाल बावड़ियां हुआ करती थीं। इसके ठीक समक्ष स्थित अत्यंत सुंदर बैजा ताल अपनी अनूठी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध था, जहां संध्या के समय शाही संगीत की महफिलें सजा करती थीं।

    दरबार हॉल की विशेषता, सोने का वर्क और दुर्लभ झूमर

    अपनी अद्वितीय सुंदरता और बनावट के कारण इस महल को 'मोतियों का राजा' कहा जाता था, जिसके फलस्वरूप इसका नाम 'मोती महल' पड़ा। इस पुराडेपो के अंदर दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, दीवारों पर उकेरी गई उत्कृष्ट रागमाला पेंटिंग्स और दो सौ वर्ष पुरानी राधा-कृष्ण की कलाकृतियां आज भी अपनी कला का लोहा मनवाती हैं। महल के मुख्य दरबार हॉल में लगभग 15 किलोग्राम शुद्ध सोने का बारीक वर्क किया गया है। इसके अतिरिक्त, इस हॉल की छत पर डेढ़ टन वजनी बेल्जियम ग्लास का एक अत्यंत दुर्लभ झूमर सुशोभित है, जिसके विषय में यह कहा जाता है कि संपूर्ण विश्व में इस डिजाइन के केवल दो ही झूमर अस्तित्व में हैं, जिनमें से एक ग्वालियर के मोती महल में है और दूसरा जर्मनी की महारानी के शाही महल में मौजूद है।

    स्वतंत्रता का प्रथम ध्वजारोहण और मध्य भारत की विधानसभा

    देश को स्वतंत्रता मिलने के उपरांत 15 अगस्त 1947 के ऐतिहासिक दिन पर ग्वालियर में सबसे पहला तिरंगा इसी मोती महल के प्रांगण में फहराया गया था। नवगठित 'मध्य भारत' राज्य की राजधानी ग्वालियर को बनाया गया था और मोती महल के दरबार हॉल को उसकी विधिवत विधानसभा का स्वरूप दिया गया था। वर्ष 1948 में तत्कालीन गवर्नर महाराज जीवाजी राव सिंधिया ने इसी पावन स्थल पर मध्य भारत के प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में लीलाधर जोशी को उनके पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई थी।

    बाईस रियासतों का संचालन और वर्तमान संग्रहालय स्वरूप

    वर्ष 1948 से 1956 के लंबे अंतराल तक इसी ऐतिहासिक प्रांगण से बाइस रियाசतों वाले विशाल मध्य भारत क्षेत्र की सरकार का संचालन होता रहा। वर्ष 1956 में जब राज्यों का पुनर्गठन किया गया, तब 'मध्य भारत' को एक नए और वृहद स्वरूप में आधुनिक 'मध्य प्रदेश' के रूप में स्थापित किया गया। वर्तमान समय में मध्य भारत की इस प्रथम विधानसभा यानी 'दरबार हॉल' को एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर दिया गया है। इसे अब एक भव्य संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है, जहां देश-विदेश से आने वाले पर्यटक मोती महल के दो सौ साल पुराने इतिहास और लोकतांत्रिक यात्रा के साक्ष्यों को देखकर गौरवान्वित महसूस करते हैं।

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