मुंबई: महाराष्ट्र में ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य किए जाने के निर्णय को लेकर सियासी और सामाजिक विवाद गहराता जा रहा है। राज्य के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाइक ने स्पष्ट कर दिया है कि चालकों के लिए मराठी सीखने की निर्धारित समय-सीमा (15 अगस्त) को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। नियमों की अनदेखी करने या मराठी बोलने से इनकार करने वाले चालकों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी और आवश्यकता पड़ने पर उनके परमिट भी निरस्त कर दिए जाएंगे।
विरोध में सामने आए उत्तर भारतीय संगठन
सरकार के इस रुख का कुछ चालक समूहों और उत्तर भारतीय संगठनों ने पुरजोर विरोध शुरू कर दिया है। इस बीच नवी मुंबई की 'उत्तर भारतीय विकास सेना' के अध्यक्ष संजय दुबे का एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया है, जिसमें वे खुले तौर पर यह कहते नजर आ रहे हैं कि वे रिक्शा चलाएंगे, लेकिन मराठी नहीं बोलेंगे। उनके इस बयान के बाद भाषा विवाद और अधिक गहरा गया है।
परिवहन मंत्री ने दी सख्त कार्रवाई की चेतावनी
संजय दुबे के बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए परिवहन मंत्री प्रताप सरनाइक ने कहा कि जानबूझकर मराठी भाषा का विरोध करने वालों पर आरटीओ और परिवहन विभाग कानून के तहत सख्त कदम उठाएगा। उन्होंने कहा कि जो चालक किसी भी कीमत पर मराठी न सीखने का अड़ियल रुख अपनाएंगे, उनके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की रूपरेखा तय करने के लिए शीघ्र ही उच्चस्तरीय बैठक बुलाई जाएगी।
ऐप बेस्ड कैब चालकों पर भी प्रभावी होगा नियम
नई सरकारी अधिसूचना के अनुसार, मराठी भाषा की अनिवार्यता केवल पारंपरिक ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों तक सीमित नहीं रहेगी। ओला और उबर जैसी ऐप-आधारित कैब सेवाओं के चालकों पर भी यह नियम पूरी तरह लागू होगा। नियम उल्लंघन की स्थिति में संबंधित अधिकारियों को तत्काल कार्रवाई करने के अधिकार सौंपे गए हैं।
मामले पर गरमाई राजनीति
इस फैसले ने अब राजनीतिक मोड़ भी ले लिया है। समाजवादी पार्टी के महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष अबू आजमी ने सरकार पर निशाना साधते हुए इसे वोट बैंक की ओछी राजनीति करार दिया है। उन्होंने सवाल उठाया कि बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों के कर्मचारियों की बजाय केवल गरीब रिक्शा और टैक्सी चालकों को परमिट रद्द करने की धमकी देकर डराया जा रहा है।


