रामद्वारा में चातुर्मासिक सत्संग के तहत शिवपुराण कथा का आयोजन, रुद्राक्ष के प्रकार और महत्व पर किया वर्णन
चित्तौड़गढ़। रामद्वारा में चातुर्मासिक सत्संग के तहत आयोजित महा शिवपुराण कथा में संत दिग्विजयराम महाराज ने रुद्राक्ष के धार्मिक महत्व और उसे धारण करने की विधि के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि विधि-विधानपूर्वक धारण किया गया रुद्राक्ष सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला माना गया है। रुद्राक्ष धारण करने वाले भक्त को इसके निर्धारित नियमों का भी पालन करना चाहिए।
संत दिग्विजयराम महाराज ने शिवपुराण का उल्लेख करते हुए कहा कि रुद्राक्ष को भगवान शिव के अश्रुओं से उत्पन्न माना गया है। मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए अपने अश्रुओं को पृथ्वी पर रुद्राक्ष के रूप में परिणित कर दिया। शिवपुराण में रुद्राक्ष के विभिन्न प्रकार और उनके महत्व का विस्तार से वर्णन मिलता है।
रुद्राक्ष के आकार और पहचान का बताया महत्व
संत दिग्विजयराम महाराज ने बताया कि रुद्राक्ष मुख्य रूप से तीन आकार के बताए गए हैं। इनमें आंवले के आकार, बेर के आकार और चने के आकार के रुद्राक्ष शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इनमें सबसे छोटे आकार का रुद्राक्ष सर्वोत्तम माना गया है।
उन्होंने बताया कि जिस रुद्राक्ष में कीड़ा लग गया हो, जो खंडित हो, जिसके दाने उभरे हुए न हों, जो पूरी तरह गोल न हो या जिसमें वर्ण के लक्षण न हों, ऐसे रुद्राक्ष को धारण करने योग्य नहीं माना गया है।
महाराज ने कहा कि जिस रुद्राक्ष में प्राकृतिक रूप से धागा पिरोने के लिए छेद हो, उसे उत्तम माना जाता है, जबकि जिस रुद्राक्ष में धागा पिरोने के लिए अलग से छेद करना पड़े, उसे मध्यम माना गया है।
रुद्राक्ष धारण करने वालों के लिए बताए नियम
संत दिग्विजयराम महाराज ने कहा कि रुद्राक्ष को मंगलकारी माना गया है। उन्होंने रुद्राक्ष धारण करने वाले भक्तों को इसके नियमों का पालन करने की बात कही। कथा में उन्होंने बताया कि रुद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति को मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज और सहजन का सेवन नहीं करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि धार्मिक मान्यताओं में रुद्राक्ष को भगवान शिव से जुड़ा पवित्र प्रतीक माना गया है और इसके धारण करने के साथ आचार-विचार की शुद्धता पर भी जोर दिया गया है।
एक से चौदह मुखी रुद्राक्ष का बताया महत्व
कथा के दौरान संत दिग्विजयराम महाराज ने एक से लेकर चौदह मुखी रुद्राक्ष तक के धार्मिक महत्व का वर्णन किया।
उन्होंने बताया कि एक मुखी रुद्राक्ष को महादेव का स्वरूप माना गया है और इसके दर्शन मात्र से पापों से मुक्ति की धार्मिक मान्यता है। जहां रुद्राक्ष की पूजा होती है, वहां लक्ष्मी के निवास की भी मान्यता बताई गई है।
दो मुखी रुद्राक्ष को देव देवेश्वर कहा गया है और इसे मनोकामना पूर्ण करने वाला माना गया है। तीन मुखी रुद्राक्ष को सभी विद्याओं को प्रतिष्ठित करने वाला बताया गया, जबकि चार मुखी रुद्राक्ष को ब्रह्मा का स्वरूप माना गया है।
पंचमुखी रुद्राक्ष को रुद्र स्वरूप, छह मुखी को कार्तिकेय स्वरूप और इसे दाहिनी भुजा में धारण करने का विधान बताया गया। सात मुखी रुद्राक्ष को अनंत नाम से जाना जाता है, जबकि आठ मुखी रुद्राक्ष को भैरव स्वरूप माना गया है।
महाराज के अनुसार, आठ मुखी रुद्राक्ष धारण करने वाले को पूर्णायु प्राप्त होने की धार्मिक मान्यता है। नौ मुखी रुद्राक्ष को कपिल मुनि का प्रतीक बताया गया और इसे बाएं हाथ में धारण करने का विधान बताया गया।
दस मुखी रुद्राक्ष को विष्णु स्वरूप, ग्यारह मुखी को रुद्र रूप और विजय की कामना पूरी करने वाला माना गया है। बारह मुखी रुद्राक्ष को सिर पर धारण करने का विधान बताया गया तथा इसमें बारह आदित्यों का निवास माना गया है।
इसी क्रम में तेरह मुखी रुद्राक्ष को विश्वदेवों का स्वरूप और चौदह मुखी रुद्राक्ष को भगवान शिव का स्वरूप माना गया है।
अभिमंत्रित रुद्राक्ष धारण करने पर दिया जोर
संत दिग्विजयराम महाराज ने कहा कि प्रत्येक प्रकार के रुद्राक्ष को धारण करने का अलग मंत्र बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार रुद्राक्ष को अभिमंत्रित करके धारण करना महत्वपूर्ण माना गया है।
उन्होंने कहा कि शिवपुराण में रुद्राक्ष की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। जो व्यक्ति रुद्राक्ष के महात्म्य को सुनता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होने की धार्मिक मान्यता बताई गई है।
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