जिस भाव के साथ देह का त्याग होता है उसी के अनुसार शरीर की प्राप्ति होती है
भीलवाड़ा। जैसी दृष्टि होगी वैसी ही सृष्टि होगी ओर दृष्टि है तो सृष्टि है। जिन आंखों से हम जगत को देखते है जब यहां से जाने का वक्त हो जाए तो तुम दुनिया बनाने वाले को देखने जाओंगे उस समय ये आंखे उनके लिए दे देना जिनको इस जगत को देखने की जरूरत है। ऐसी भावना से जीवन सार्थक हो जाता है। कोई मरते-मरते भी नेत्रदान कर जाए तो उसका जीवन सार्थक हो जाता है।
ये विचार अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाघीश्वर जगतगुरू आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने मंगलवार को ‘‘विश्व शांति कल्याण’’ चातुर्मास के तहत दैनिक सत्संग में नेत्रदान के महत्व पर चर्चा करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि देहदान, नेत्रदान करना सेवा का पुनीत कार्य है। कोई भी दान करे हम कई गुना बढ़ कर वापस प्राप्त होता है। नेत्रदान करने वालों को परमात्मा के दिव्य चक्षु प्राप्त हो जाते है। मरने के बाद शरीर राख हो जाए उससे अच्छा है किसी के काम आए। हमारे महापुरूषों ने भी नेत्रदान किए है। जिसे नेत्र प्राप्त होते है वह जगत के दर्शन कराने वाले के प्रति अहोभाव कभी कम नहीं कर सकता।
आचार्यश्री ने कहा कि मृत्यु का समय आए तो मुख से केवल राम का नाम निकलता रहे तो आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है ओर संसार में किसी योनी में नहीं आना पड़ता है। मरते समय जिस भाव के साथ देह का त्याग होता है उसी के अनुसार शरीर की प्राप्ति होती है। किसी का मन में मरते समय मकान या सांसारिक सुखों में रह जाए तो उसकी गति बिगड़ जाती है। इंसान को अंतिम समय आने पर परमात्मा के अलावा किसी अन्य का चिंतन नहीं करना चाहिए। मरते समय राम नाम लेने ओर सुनने से जीवन का उद्धार हो जाता है।
उन्होंने कहा कि हम किसी को कुछ भी कहे पर सामने वाला वैसा ही कहे दे तो अहंकार को चोट लगती है। याद रखे आंख बंद कर लेने से हालात नहीं बदल जाते है। ये मानना कि मेरे अलावा कोई कुछ नहीं जानता अभिमान व अज्ञान का प्रतीक है।
आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि अपने अंतर चक्षु खोल कर देखेंगे तो पता चलेगा कि हम क्या सही ओर क्या गलत कर रहे है। जब तक मन की आंखे नहीं खुलेंगी हम अपनी गलतियों का अहसास नहीं होगा। व्यक्ति अपने कर्मो का फल भुगत रहा है फिर भी दुर्भाग्य उसके अंदर की आंखे नहीं खुल पा रही है। हम जैसा बोलेंगे वैसा ही सुनना भी पड़ेगा। सम्मानीय लोग मर्यादा व शिष्टता तोड़ेंगे तो दूसरे क्या सीखेंगे। माता पिता या गुरू की भाषा गलत होगी तो बच्चें क्या सीखेंगे।
उन्होंने जीव दया का संदेश देते हुए कहा कि पशु पक्षी को मारने का हमे कोई अधिकार नहीं है। जो इनको मारेंगे उन्हें परिणाम भी भुगतने पड़ेंगे। पापी पेट के लिए कभी जीव हिंसा नहीं करनी चाहिए।
आचार्यश्री ने किया नेत्रदान पोस्टर बैनर का विमोचन
सत्संग में आचार्य श्रीरामदयाल महाराज ने आई बैंक सोसायटी ऑफ राजस्थान के भीलवाड़ा चैप्टर द्वारा नेत्रदान जागरूकता अभियान के तहत मनाए जा रहे नेत्रदान पखवाड़े के पोस्टर बैनर का विमोचन किया। उन्होंने कहा कि नेत्रदान कोई एक पखवाड़े तक सीमित नहीं होकर हमेशा किया जाना चाहिए। रामस्नेही चिकित्सालय के रतन दरगड़ ने चिकित्सालय में उपलब्ध नेत्र सम्बन्धी सुविधाओं के बारे में जानकारी दी।
नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ.प्रतिष्ठा ने नेत्रदान कौन कर सकता ओर इसका क्या महत्व है इस बारे में बताया। प्रवचन के बाद कई श्रद्धालुओं ने नेत्रदान संकल्प पत्र भरे। आचार्यश्री से पूर्व अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस प्रवचन दिया। प्रवचन के विश्राम पर श्रद्धालुओं द्वारा आचार्यश्री रामदयालजी महाराज की आरती की गई। सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
चातुर्मास में दैनिक सत्संग का समय सुबह 9 से 10 बजे तक है। रामधुनी के साथ सुबह 8.30 से 9 बजे तक वाणीजी का पाठ हो रहा है। सूर्यास्त के समय संध्या आरती एवं रामस्नेही सम्प्रदाय के युवा संत रामजस ईडर द्वारा भक्तमाल की कथा में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे है।
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