पुरी। ओडिशा के प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ मंदिर में जन्माष्टमी के पावन अवसर पर शुक्रवार को करीब पांच घंटे तक आम श्रद्धालुओं के लिए दर्शन स्थगित रहेंगे। मंदिर प्रशासन के अनुसार, यह व्यवस्था रात 7:00 बजे से मध्यरात्रि तक लागू रहेगी। इस समयावधि के दौरान मंदिर में श्रीकृष्ण जन्म से जुड़े विशेष अनुष्ठान और गुप्त नीतियां संपन्न की जाएंगी।
भगवान जगन्नाथ को माना जाता है सभी अवतारों का मूल
पुरी की समृद्ध परंपरा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ को महाविष्णु और सृष्टि का मूल माना जाता है। उन्हें भगवान विष्णु के सभी दस अवतारों—जिनमें श्रीकृष्ण, श्रीराम और भगवान बलराम शामिल हैं—का जननी रूप दिया गया है। इसी वजह से जगन्नाथ मंदिर में भगवान विष्णु के सभी अवतारों के जन्मोत्सव बड़े ही विशेष भाव के साथ मनाए जाते हैं।
प्रसव पीड़ा कम करने की परंपरा और जेउता भोग
कृष्ण जन्मोत्सव की पूर्व संध्या पर भगवान जगन्नाथ को 'जेउता भोग' अर्पित किया जाता है। जगन्नाथ संस्कृति के शोधकर्ताओं के अनुसार, यह एक विशेष औषधीय भोग होता है, जिसका संबंध प्रसव पीड़ा को कम करने की प्रतीकात्मक परंपरा से जुड़ा है। यह विशेष भोग मंदिर के मुख्य कपाट बंद होने से ठीक पहले लगाया जाता है।
मातृ रूप में पूजा और कृष्ण जन्म नीति
अनुष्ठान के दौरान भगवान जगन्नाथ श्रीकृष्ण को जन्म देने वाली माता की भूमिका में होते हैं। जेउता भोग के बाद प्रभु की विशेष आरती की जाती है और इसके उपरांत 'कृष्ण जन्म नीति' का गुप्त विधान शुरू होता है। इसी अति-संवेदनशील और आध्यात्मिक अनुष्ठान के कारण रात 7:00 बजे से मध्यरात्रि तक सर्वसाधारण के लिए प्रवेश और दर्शन पूरी तरह प्रतिबंधित रहेंगे।
पुरुष और प्रकृति का अद्वितीय संगम
पुरी के गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव के अनुसार, भगवान जगन्नाथ केवल एक रूप तक सीमित नहीं हैं; वे पुरुष और स्त्री दोनों रूपों की मूल शक्ति हैं। पूरी सृष्टि का सृजन इसी पराशक्ति से हुआ है। इसी अद्भुत मान्यता के कारण जगन्नाथ मंदिर में विभिन्न अवतारों के जन्म से जुड़ी रीतियां अत्यंत श्रद्धा और विशिष्ट धार्मिक विधानों के साथ पूरी की जाती हैं।


