दसलक्षण धर्म की पूर्णाहुति पर क्षमावाणी का आयोजन, जैन समाज लक्ष्मणगढ़ ने अहंकार और कषाय त्यागने का लिया संकल्प
लक्ष्मणगढ़। दसलक्षण यानी पर्यूषण महापर्व के समापन पर लक्ष्मणगढ़ में जैन समाज की ओर से पारंपरिक श्रद्धा और उत्साह के साथ क्षमावाणी पर्व मनाया गया। इस अवसर पर श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में भगवान जिनेंद्र का विशेष कलशाभिषेक, शांतिधारा एवं पूजा-अर्चना की गई। धार्मिक अनुष्ठानों में जैन समाज के बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
दसलक्षण धर्म की पूर्णाहुति
दस दिनों तक चले दसलक्षण धर्म में उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन और उत्तम ब्रह्मचर्य जैसे धर्मों का पालन एवं पूजन किया गया। पर्व की पूर्णाहुति के बाद मंदिर में क्षमावाणी कलशाभिषेक और पूजा का आयोजन हुआ।
पूजा समाप्त होने के बाद उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने एक-दूसरे के प्रति मन में मौजूद अहंकार एवं कषायों को त्यागकर हाथ जोड़कर उत्तम क्षमा मांगी। वर्षभर में जाने-अनजाने मन, वचन अथवा काया से किसी का दिल दुखाने पर सामूहिक एवं व्यक्तिगत रूप से क्षमा याचना की गई।
श्रद्धालुओं ने आपसी द्वेष और कड़वाहट को दूर कर प्रेम एवं सद्भाव के साथ एक-दूसरे को क्षमा किया। इस अवसर पर स्थानीय जैन समाज के लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
क्षमा वीरों का आभूषण है
कार्यक्रम में वक्ताओं ने भगवान महावीर के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए क्षमा वीरस्य भूषणम् का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि क्षमा कमजोरी नहीं बल्कि आत्मबल और संयम का प्रतीक है।
क्षमावाणी पर्व को मैत्री दिवस के रूप में मनाते हुए समाज में प्रेम, अपनापन और सांप्रदायिक सौहार्द बढ़ाने का संकल्प लिया गया।
अहंकार और कषाय छोड़ने की प्रेरणा
वक्ताओं ने कहा कि पर्यूषण के अंतिम दिन मनाया जाने वाला क्षमावाणी पर्व राग-द्वेष और अहंकार से दूर होने का अवसर देता है। व्यक्ति को अपने पद और प्रतिष्ठा का अहंकार नहीं करना चाहिए तथा धर्म के मार्ग पर चलते हुए जीवन में विनम्रता बनाए रखनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि तप का जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। तप व्यक्ति द्वारा किए गए गलत कर्मों को दूर करने, आत्मा को निखारने और आत्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ने का माध्यम है। अपने भीतर की ऊर्जा को अंतर्मुखी करने की प्रक्रिया ही तप है।
वक्ताओं ने कहा कि अहंकारवश हुई गलतियों को सुधारने का सबसे अच्छा उपाय है कि व्यक्ति शुद्ध अंतःकरण से अपनी भूल स्वीकार करे और स्वयं के साथ-साथ दूसरों के प्रति भी विनम्रता का भाव रखे।
क्रोध पर संयम और सभी जीवों के प्रति मैत्री का संदेश
वर्तमान भागदौड़ भरी जिंदगी में क्रोध को सामान्य प्रवृत्ति बताते हुए वक्ताओं ने कहा कि क्रोध एक कषाय है और इसके आवेग में व्यक्ति विवेक खो बैठता है। क्रोध व्यक्ति को उसकी वास्तविक स्थिति से विचलित कर देता है। इसलिए जीवन में क्षमा का भाव रखना आवश्यक है और यह भावना सभी जीवों के प्रति होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि सभी के प्रति मैत्री का भाव रखना ही दसलक्षण पर्व की प्रमुख सीख है। क्षमावाणी पर्व मन के बैर-भाव को समाप्त करने और आत्मशुद्धि का अवसर प्रदान करता है। सभी से क्षमा मांगने और सभी को क्षमा करने से मन में शांति और आत्मिक निर्मलता का भाव उत्पन्न होता है।
इसी भावना के साथ जैन समाज के लोगों ने सबको क्षमा, सबसे क्षमा का संदेश देते हुए पर्व का समापन किया।
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