मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने फार्मास्युटिकल कंपनी ‘सुप्रिया लाइफसाइंस लिमिटेड’ को बड़ी राहत देते हुए कस्टम विभाग द्वारा जब्त की गई 200 किलोग्राम केटामाइन हाइड्रोक्लोराइड की खेप को सशर्त छोड़ने का आदेश दिया है। जब्त की गई इस खेप की कुल कीमत करीब 72 लाख रुपये आंकी गई है। अदालत ने पूरी स्थिति का जायजा लेने के बाद नई निर्यात अनुमति (एक्सपोर्ट ऑथराइजेशन) हासिल करने में हुई देरी को एक सामान्य तकनीकी चूक माना है।
न्यायमूर्ति एम. एस. कर्णिक और न्यायमूर्ति संदीप डी. पाटील की खंडपीठ ने कस्टम विभाग के सहायक आयुक्त द्वारा 10 अगस्त को जारी किए गए अस्वीकृति आदेश को रद्द करते हुए इस खेप को प्रोविजनल रिलीज (अस्थाई तौर पर रिहा) करने का निर्देश दिया है। हालांकि, अदालत ने कंपनी के सामने शर्त रखी है कि उसे एक हफ्ते के भीतर कस्टम विभाग के पास 72 लाख रुपये जमा कराने होंगे।
पूरा मामला और निर्यात में देरी की वजह
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब सुप्रिया लाइफसाइंस लिमिटेड को दक्षिण कोरिया की एक कंपनी से 200 किलो केटामाइन हाइड्रोक्लोराइड के निर्यात का बड़ा ऑर्डर मिला था। कंपनी ने इसके लिए केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो (CBN) से निर्यात अनुमति ले रखी थी, जो 31 मई 2026 तक वैध थी।
कंपनी के वकीलों (सुजय कांटावाला और डेरियस श्रॉफ) ने अदालत को बताया कि विदेशी खरीदार ने बाद में शिपमेंट के बैच को लेकर कुछ सवाल खड़े कर दिए, जिसके चलते कंपनी को नया बैच तैयार कराना पड़ा। इस प्रक्रिया में देरी हुई और कंपनी ने 1 जून को संशोधित दस्तावेज जमा किए, 2 जून को शिपिंग बिल दाखिल किया और 4 जून को खेप सहार स्थित एयर कार्गो कॉम्प्लेक्स भेज दी। इसके अगले दिन यानी 5 जून को कस्टम विभाग ने निर्यात अनुमति की अवधि समाप्त होने पर आपत्ति जता दी। इसके बाद कंपनी ने नई अनुमति मिलने तक माल को बॉन्डेड वेयरहाउस में सुरक्षित रखने का अनुरोध किया था।
अधिकारियों की गिरफ्तारी और जब्ती की कार्रवाई
गिरफ्तारी: 2 जुलाई को कस्टम अधिकारियों ने इस मामले में एनडीपीएस अधिनियम की धारा 67 के तहत कंपनी के जनरल मैनेजर (सेल्स एंड मार्केटिंग) और कस्टम ब्रोकर को समन भेजा और बिना वैध अनुमति के केटामाइन निर्यात करने के कथित प्रयास के आरोप में दोनों को गिरफ्तार कर लिया।
माल की जब्ती: कस्टम विभाग ने एनडीपीएस एक्ट की धारा 42 के तहत इस खेप को अपने कब्जे में ले लिया।
नई अनुमति मिलना: इस बीच, विदेशी खरीदार ने नया इंपोर्ट सर्टिफिकेट हासिल कर लिया और कंपनी ने भी नई एक्सपोर्ट ऑथराइजेशन के लिए आवेदन कर दिया। नारकोटिक्स ब्यूरो ने 9 जुलाई को ही नई निर्यात अनुमति जारी कर दी, जो 9 अक्टूबर तक वैध थी और इसमें उसी मात्रा व खरीदार को माल भेजने की अनुमति थी। हालांकि, कस्टम विभाग ने यह कहते हुए प्रोविजनल रिलीज का आवेदन ठुकरा दिया कि नई अनुमति शिपिंग बिल और जब्ती के बाद मिली है।
बॉम्बे हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां और फैसला
अदालत ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि कंपनी का पुराना रिकॉर्ड साफ रहा है और वह इससे पहले भी वैध अनुमतियों के साथ केटामाइन का निर्यात करती रही है। हाईकोर्ट ने इन बिंदुओं पर विशेष ध्यान दिया:
खरीदार द्वारा बैच पर सवाल उठाने के कारण कंपनी को नया बैच तैयार करना पड़ा था।
जिस समयावधि में पुरानी अनुमति समाप्त हुई, उस दौरान माल वास्तव में देश से बाहर निर्यात नहीं हुआ था, बल्कि देश के भीतर ही था।
कंपनी ने बाद में सक्षम प्राधिकारी (नारकोटिक्स ब्यूरो) से उसी खेप के लिए वैध नई निर्यात अनुमति भी प्राप्त कर ली थी।
इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने देरी को महज एक 'तकनीकी चूक' माना और 72 लाख रुपये जमा करने की शर्त पर खेप को छोड़ने का आदेश दिया। साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि इस प्रोविजनल रिलीज से कस्टम विभाग की चल रही विभागीय या आपराधिक कानूनी कार्यवाही पर कोई असर नहीं पड़ेगा और विभाग कानून के अनुसार अपनी जांच जारी रख सकता है।


