प्राकृत सीखने और समझने का सबसे उत्तम माध्यम हर शहर-गांव में जैन पाठशालाओं का संचालन

निलेश कांठेड़, स्वतंत्र पत्रकार, भीलवाड़ा
चातुर्मास काल में होने वाले धार्मिक आयोजनों और प्रवचनों में इन दिनों जनगणना को लेकर इस बात पर विशेष जोर दिया जा रहा है कि धर्म के कॉलम में ‘जैन’ और तीसरी भाषा के रूप में ‘प्राकृत’ दर्ज कराया जाए। इसमें कोई बुराई नहीं है, बल्कि वर्तमान समय में यह एक महत्वपूर्ण आवश्यकता भी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल सरकारी रिकॉर्ड में जैन धर्म और प्राकृत भाषा दर्ज करा देने भर से हम अपने धर्म, संस्कृति, दर्शन और भाषा का भविष्य सुरक्षित कर पाएंगे?
व्यावहारिक धरातल पर तस्वीर कुछ अलग है। जनगणना के आंकड़े भले ही कुछ भी कहें, लेकिन समाज के स्तर पर हमें अपनी जनसंख्या में निरंतर हो रही कमी को गंभीरता से समझना होगा। दूसरी ओर हमारी वर्तमान और नई पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा प्राकृत भाषा के महत्व, इतिहास और साहित्य से पर्याप्त रूप से परिचित नहीं है। स्थिति यह है कि प्राकृत में लिखे अनेक धर्मग्रंथों और आगमों को पढ़ने और समझने में नई पीढ़ी स्वयं को असहज महसूस करती है।
केवल रिकॉर्ड में प्राकृत लिख देने से भाषा सुरक्षित नहीं होगी। इसके लिए हमें प्राकृत में लिखे आगमों, धर्मग्रंथों और साहित्य का अध्ययन बढ़ाना होगा तथा नई पीढ़ी को अपनी सुविधानुसार इन्हें पढ़ने और समझने के लिए प्रेरित करना होगा। जब तक हम अपने धर्म के मूल भाव और दर्शन को नहीं समझेंगे, तब तक उसे अपने जीवन में उतारना भी कठिन रहेगा और प्राकृत भाषा को सहज रूप से संरक्षित करना भी चुनौती बना रहेगा।
जैन पाठशालाएं बनें संस्कार और भाषा संरक्षण का केंद्र
प्राकृत सीखने और समझने का सबसे प्रभावी माध्यम हर शहर और गांव में जैन पाठशालाओं के संचालन को बढ़ावा देना हो सकता है। इन पाठशालाओं को केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित रखने के बजाय इन्हें जैन दर्शन, प्राकृत भाषा, आगम साहित्य और संस्कारों के अध्ययन का केंद्र बनाया जाना चाहिए। परिवारों को अपने बच्चों और युवाओं को नियमित रूप से इन पाठशालाओं से जोड़ने के लिए प्रेरित करना होगा।
अब बात जनगणना में धर्म के कॉलम में ‘जैन’ लिखाने और सरकारी रिकॉर्ड में समाज की संख्या बढ़ाने की मुहिम की। यदि प्रत्येक जैन परिवार जनगणना में अपने धर्म के रूप में ‘जैन’ दर्ज कराता है तो निश्चित रूप से सरकारी आंकड़ों में वर्ष 2011 की तुलना में जैन आबादी में वृद्धि दिखाई दे सकती है। लेकिन इसके साथ हमें यह भी देखना होगा कि वास्तविक सामाजिक स्थिति क्या है। परिवारों का आकार लगातार छोटा होता जा रहा है। पहले एक परिवार में तीन-चार बच्चों का होना सामान्य माना जाता था, लेकिन अब ‘हम दो, हमारा एक’ जैसी सोच समाज के एक बड़े हिस्से में दिखाई देती है।
शहरी क्षेत्रों में अनेक युवा दंपतियों के परिवारों में एक ही संतान देखने को मिलती है। कुछ दंपति विवाह के लंबे समय बाद भी संतान न होने का व्यक्तिगत निर्णय लेते हैं। व्यक्तिगत स्तर पर यह उनका निजी निर्णय है और उसका सम्मान होना चाहिए, लेकिन व्यापक सामाजिक परिप्रेक्ष्य में लगातार घटती जन्मदर समाज के भविष्य से जुड़े कई सवाल खड़े करती है।
किसी भी समाज की निरंतरता उसकी अगली पीढ़ी से होती है। इसलिए जैन समाज को जनसंख्या के सवाल पर भावनात्मक नारेबाजी के बजाय गंभीर सामाजिक विमर्श की आवश्यकता है। परिवारों की आर्थिक स्थिति, बच्चों की शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और भविष्य की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर समाज को सहयोगी व्यवस्था विकसित करनी होगी। जरूरतमंद परिवारों को अधिक संतान के पालन-पोषण और शिक्षा में सहायता देने जैसी योजनाओं पर भी विचार किया जा सकता है।
साथ ही यह भी जरूरी है कि परिवार और संतान से जुड़े निर्णयों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक चिंताओं के बीच संतुलन रखा जाए। समाज का उद्देश्य किसी परिवार पर दबाव बनाना नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियां तैयार करना होना चाहिए जिनमें परिवार अपनी इच्छा और क्षमता के अनुसार अगली पीढ़ी के भविष्य को लेकर सकारात्मक निर्णय ले सकें।
पहचान केवल आंकड़ों में नहीं, व्यवहार में भी हो
जैन समाज के सामने आज दो समानांतर चुनौतियां हैं—अपनी जनसंख्या और सामाजिक निरंतरता को लेकर जागरूक होना तथा अपनी भाषा और ज्ञान परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना। जनगणना में ‘जैन’ लिखाना हमारी पहचान का दस्तावेजीकरण है, लेकिन जैन होना केवल किसी सरकारी फॉर्म के एक कॉलम तक सीमित नहीं रह सकता।
इसी तरह प्राकृत को भाषा के कॉलम में दर्ज करना तभी सार्थक होगा, जब हमारे घरों, पाठशालाओं और अध्ययन केंद्रों में प्राकृत को पढ़ने-समझने का वातावरण भी बने।
हमें बच्चों और युवाओं में जैन होने का गौरव जगाने के साथ उन्हें जैन दर्शन की वैज्ञानिकता, अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांत और आत्मानुशासन जैसे मूल्यों से परिचित कराना होगा। प्राकृत भाषा को कठिन विषय मानने के बजाय उसे अपनी ज्ञान परंपरा की कुंजी के रूप में प्रस्तुत करना होगा।
जनगणना में संख्या दर्ज होना जरूरी है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है कि हमारी संस्कृति, भाषा, विचार और जीवन-मूल्य अगली पीढ़ी तक जीवित रहें। यदि हम संख्या और भाषा—दोनों मोर्चों पर समय रहते जागरूक नहीं हुए तो आने वाले समय में जैन संस्कृति और दर्शन के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
इसलिए आवश्यकता केवल यह कहने की नहीं कि ‘जनगणना में जैन लिखाएं और प्राकृत दर्ज कराएं’, बल्कि इसके साथ यह संकल्प लेने की भी है कि जैन पहचान को जीवन में उतारेंगे और प्राकृत ज्ञान परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाएंगे।

