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    युवराज सिंह केस में साकेत कोर्ट का अहम आदेश, जांच से जुड़े चिकित्सा अधिकारी तलब

    नई दिल्ली (दिल्ली)। नई दिल्ली स्थित साकेत न्यायालय ने गुरुग्राम पुलिस द्वारा युवराज सिंह मनचंदा के शव के रखरखाव और प्रबंधन में बरती गई कथित गंभीर लापरवाहियों तथा चूकों की न्यायिक जाँच के आदेश दिए हैं। अदालत ने इस मामले में गुरुग्राम पुलिस को इसके लिए उत्तरदायी ठहराया है, क्योंकि पूरी प्रक्रिया के दौरान कई गंभीर प्रशासनिक व प्रक्रियागत अनियमितताएं सामने आई हैं।

    पुलिस की कार्यप्रणाली में गंभीर अनियमितताएं और देरी

    न्यायालय के संज्ञान में आया है कि पुलिस ने मृतक का विवरण 'जिपनेट' (ZIPNET) पोर्टल पर अपलोड करने में पूरे छह दिनों का विलंब किया। इसके अतिरिक्त, इस अत्यंत संवेदनशील मामले में नियमानुसार पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी (वीडियो रिकॉर्डिंग) न कराए जाने की गंभीर विफलता भी उजागर हुई है। पुलिस पर यह भी आरोप है कि उन्होंने वैधानिक प्रक्रियाओं और दिशा-निर्देशों का अपेक्षित अनुपालन नहीं किया। इन सभी गंभीर बिंदुओं को आधार बनाते हुए अदालत ने उच्चस्तरीय जाँच के आदेश पारित किए हैं।

    सिविल अस्पताल के चिकित्सा अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से किया गया तलब

    इस पूरे प्रकरण में केवल पुलिस ही नहीं, बल्कि चिकित्सा पक्ष की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। अदालत ने गुरुग्राम स्थित सिविल अस्पताल के संबंधित चिकित्सा अधिकारी को नोटिस जारी कर तलब किया है। उन्हें आगामी 15 अक्टूबर को अदालत के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा। चिकित्सा अधिकारी को पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पाई गई विसंगतियों और कमियों पर अपना विस्तृत लिखित स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है। यह आदेश शव प्रबंधन और चिकित्सीय रिपोर्ट में पूरी पारदर्शिता तथा सटीकता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से दिया गया है।

    जांच के प्रमुख बिंदु और आगामी कानूनी प्रक्रिया

    अदालत के आदेशानुसार जाँच के दायरे में मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं को शामिल किया गया है:

    • जिपनेट (ZIPNET) पोर्टल पर शव की सूचना और विवरण दर्ज करने में छह दिनों की अनावश्यक और संदेहास्पद देरी।

    • अनिवार्य होने के बावजूद पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी न कराए जाने की गंभीर चूक।

    • कानूनी और वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करने में पुलिस की विफलता के आरोपों की तह तक पड़ताल।

    न्यायालय का यह कड़ा कदम इस बात को रेखांकित करता है कि आपराधिक मामलों या शव प्रबंधन से जुड़ी प्रक्रियाओं में किसी भी प्रकार की लापरवाही या पारदर्शिता का अभाव बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई और जाँच की रिपोर्ट पर अदालत की पैनी नजर बनी हुई है।

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