नई दिल्ली| दिल्ली जाने वाली सिक्किम महानंदा एक्सप्रेस के गत सात सितंबर को बिहार के आरा जंक्शन रेलवे स्टेशन के पास पटरी से उतरने के मामले में एक नया और चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। आधिकारिक रेलवे रिकॉर्ड के अनुसार, ट्रेन के लोको पायलट को इस विशेष रूट की पूरी और पर्याप्त जानकारी (रूट लर्निंग) नहीं थी। घटना के तुरंत बाद कराई गई प्रारंभिक उच्चस्तरीय जाँच में लोको पायलट और सहायक लोको पायलट को पहले लाल सिग्नल (डेंजर सिग्नल) पार करने और उसके बाद ट्रेन को वापस उसी स्थिति में लाने के प्रयास के लिए पूरी तरह जिम्मेदार पाया गया है, और इसी प्रक्रिया के दौरान ट्रेन बेपटरी (डिरेल) हो गई थी।
यह पूरा क्रू प्रयागराज डिवीजन से संबंधित था। इस गंभीर लापरवाही के सामने आने के बाद लोको पायलट और असिस्टेंट लोको पायलट के साथ-साथ डिप्टी क्रू कंट्रोलर और चीफ लोको इंस्पेक्टर को भी तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया है।
रेलवे बोर्ड की कड़ी चेतावनी का उल्लंघन
रेलवे रिकॉर्ड से यह भी बात सामने आई है कि उचित रूट लर्निंग प्रक्रिया को पूरा किए बिना चालक दल (क्रू) की तैनाती करना न केवल रेलवे के स्थापित नियमों का खुला उल्लंघन था, बल्कि यह हादसे से करीब दो सप्ताह पूर्व रेलवे बोर्ड द्वारा जारी की गई एक सख्त चेतावनी के भी बिल्कुल विरुद्ध था। रेलवे बोर्ड ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि इस तरह के नियमों के उल्लंघन पर बेहद कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए।
बोर्ड की यह चेतावनी आसनसोल डिवीजन में एक लोको पायलट द्वारा लाल सिग्नल पार किए जाने की घटना के बाद आई थी, जहाँ उस पायलट को भी बिना रूट लर्निंग पूरी किए ट्रेन पर तैनात कर दिया गया था। इसके मद्देनजर रेलवे बोर्ड ने गत 24 अगस्त 2026 को देश के सभी रेलवे जोन को लिखित निर्देश जारी कर कहा था कि उचित रूट लर्निंग के साथ ही चालक दल की बुकिंग सुनिश्चित की जाए।
क्या हैं रेलवे के नियम और कहाँ हुई गड़बड़ी?
देशभर के सभी रेल डिवीजनों को बोर्ड का स्पष्ट पत्र मिलने के बावजूद, प्रयागराज डिवीजन के अधिकारियों ने न केवल नियमों को ताक पर रखकर लोको पायलट की बुकिंग की, बल्कि कथित तौर पर 'क्रू मैनेजमेंट सिस्टम' में मैन्युअल रूप से हेरफेर भी किया। इस डिजिटल सिस्टम में ऐसी गलत तैनाती को रोकने के लिए पहले से ही सुरक्षा व्यवस्था मौजूद है।
रेलवे नियमों के अनुसार, यदि कोई लोको पायलट छह महीने से दो साल की अवधि के बीच किसी खास रूट पर ट्रेन का संचालन नहीं करता है, तो उसे उस रूट की कम से कम दो रूट-लर्निंग यात्राएं पूरी करनी अनिवार्य होती हैं। सिक्किम महानंदा एक्सप्रेस के इस लोको पायलट ने 1 जुलाई 2026 को इस रूट पर केवल एक ही रूट-लर्निंग यात्रा की थी। इसके बावजूद, 14 जुलाई 2026 से उसे इस रूट पर नियमित लोको पायलट के रूप में तैनात कर दिया गया, जबकि उसकी दूसरी रूट-लर्निंग यात्रा अधूरी थी। सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि रूट की हर छोटी जानकारी—जैसे तीखे मोड़, ढलान, और सिग्नलों की सटीक दूरी—ट्रेन संचालन के लिए बेहद जरूरी होती है, और अधूरी ट्रेनिंग बड़े हादसे को न्यौता दे सकती है।
रेलवे अधिकारियों के अलग-अलग तर्क
इस पूरे मामले पर प्रयागराज डिवीजन के वरिष्ठ अधिकारियों ने नियमों के उल्लंघन को मामूली बताने की कोशिश की। उनका तर्क था कि उक्त लोको पायलट ने 14 जुलाई से 6 सितंबर के बीच इस रूट पर पहले ही साढ़े पाँच यात्राएँ पूरी कर ली थीं। अधिकारियों का कहना था कि घटना वाले दिन वापसी के वक्त सिग्नल पार करने और ट्रेन को पीछे लाने के प्रयास में यह दुर्घटना हुई, जिसका सीधा संबंध शुरुआती रूट-लर्निंग से नहीं था। चूँकि यह घटना ईस्ट सेंट्रल रेलवे जोन के अंतर्गत हुई है, इसलिए नियमानुसार आगे की जाँच की जा रही है।
दूसरी ओर, रेलवे के स्वतंत्र सुरक्षा अधिकारियों ने इसे एक बेहद गंभीर और आपराधिक लापरवाही करार दिया है। उनका कहना है कि भले ही अपर्याप्त रूट लर्निंग का डिरेलमेंट से प्रत्यक्ष तकनीकी संबंध न माना जाए, लेकिन यह स्पष्ट रूप से रेलवे के सुरक्षा नियमों का गंभीर उल्लंघन है। सुरक्षा जानकारों की माँग है कि केवल मैदानी कर्मचारियों पर ही नहीं, बल्कि उन जिम्मेदार वरिष्ठ अधिकारियों पर भी कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए जिन्होंने नियमों को ताक पर रखकर यात्रियों की जान को सीधे जोखिम में डाला था।


