जयपुर. शहरी विकास और स्थानीय निकायों के सशक्तिकरण में पार्षदों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। एक प्रभावी पार्षद न केवल अपने वार्ड की जरूरतों को नगर निकाय तक पहुँचाता है, बल्कि निकाय की वित्तीय स्थिति मजबूत करने में भी अहम योगदान दे सकता है।
निकाय की तिजोरी भरने के लिए पार्षदों के कदम
करदाताओं की सहूलियत: कर भुगतान की प्रक्रिया को आसान बनाकर अधिक से अधिक नागरिकों को कर चुकाने के लिए प्रेरित किया जाए।
भवन और भूमि कर: लोगों को समझाएं कि उनके द्वारा चुकाया गया कर ही वापस उनकी गलियों और सड़कों के विकास में उपयोग होता है।
प्रदूषण और विज्ञापन शुल्क: प्रदूषण फैलाने वाले प्रतिष्ठानों से पूरा शुल्क वसूलने के साथ-साथ सार्वजनिक और निजी संपत्तियों पर लगे विज्ञापनों का पूरा राजस्व सुनिश्चित किया जाए।
वैध लाइसेंस प्रणाली: व्यापारिक गतिविधियों का नियमन करवाकर वैध लाइसेंस प्रणाली को बढ़ावा दिया जाए, जिससे भ्रष्टाचार और मुकदमों में कमी आए।
प्रमुख वित्तीय स्रोत और अधिकार
निकाय बजट: अपने वार्ड के लिए बजट का अधिकतम हिस्सा सुनिश्चित करें ताकि अधिक विकास कार्य हो सकें।
केंद्र/राज्य बजट: क्षेत्र में नई योजनाएं स्वीकृत कराने और उनमें आ रही बाधाओं को दूर करने की दिशा में कार्य करें।
सांसद-विधायक कोष: समस्याओं की ठोस पहचान कर तैयार प्रस्तावों के जरिए सांसद और विधायक कोष से आसानी से कार्य स्वीकृत कराएं।
जनसहयोग और सीएसआर (CSR) का मॉडल
विकास कार्यों के लिए केवल सरकारी बजट पर निर्भर रहने के बजाय स्थानीय व्यापार मंडलों, उद्योगपतियों और जनसहयोग को जोड़ना चाहिए। सीएसआर (कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व) फंड के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य और पेयजल जैसे बुनियादी विकास कार्य आसानी से करवाए जा सकते हैं।
व्यापार और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर
यदि क्षेत्र में साफ-सुथरा माहौल हो और पार्किंग की उचित व्यवस्था हो, तो ग्राहकों की आवाजाही बढ़ती है जिससे स्थानीय कारोबार को गति मिलती है। बाजार में पैसे का चक्र तेज होने से व्यापारिक लाभ के साथ-साथ नागरिकों को भी बेहतर सुविधाएं और सुगम वातावरण प्राप्त होता है।


