श्राद्ध और तर्पण के लिए खास दिन, पूर्वजों के निमित्त दान-पुण्य और धार्मिक कर्म करने की परंपरा
लक्ष्मणगढ़। वर्ष 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर, शनिवार को मनाई जाएगी। इसी दिन पितृ पक्ष का समापन होगा। पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि 9 अक्टूबर की रात 9:35 बजे से शुरू होकर 10 अक्टूबर की रात 9:19 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध किया जाएगा।
योग शिक्षक पंडित लोकेश कुमार ने बताया कि सर्वपितृ अमावस्या पितृ पक्ष की अंतिम तिथि होती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन उन पूर्वजों का भी श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती। यदि किसी कारण से पूर्वजों की निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं किया जा सका हो तो भी सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध और तर्पण किया जाता है।
पितृ पक्ष के समापन का विशेष महत्व
पंडित लोकेश कुमार ने बताया कि आश्विन मास की अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। धार्मिक परंपरा में इस दिन पूर्वजों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और दान-पुण्य करने का विशेष महत्व माना गया है।
उन्होंने बताया कि इस दिन पवित्र नदी में स्नान, तर्पण और दान करने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इन कर्मों के माध्यम से पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है और उनकी शांति एवं सद्गति के लिए प्रार्थना की जाती है।
10 अक्टूबर को ऐसे करें श्राद्ध
सर्वपितृ अमावस्या के दिन प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद श्रद्धापूर्वक अपने पितरों का स्मरण करते हुए अपनी कुल परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार तर्पण, श्राद्ध तथा अन्य धार्मिक कर्म किए जा सकते हैं।
पूर्वजों की शांति और सद्गति के लिए भगवान से प्रार्थना करने की भी परंपरा है।
श्राद्ध और तर्पण के प्रमुख मुहूर्त
10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध कर्म के लिए कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल महत्वपूर्ण माने जाते हैं। पंचांग स्रोत के अनुसार समय इस प्रकार है:
- कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:47 बजे से दोपहर 12:34 बजे तक
- रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:34 बजे से 1:20 बजे तक
- अपराह्न काल: दोपहर 1:20 बजे से 3:40 बजे तक
ये समय स्थान के अनुसार कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकते हैं।
तर्पण और पिंडदान की विधि
धार्मिक परंपरा के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या पर पवित्र स्थान पर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। नदी के किनारे बैठकर सभी पूर्वजों का स्मरण कर संकल्प लिया जाता है।
तर्पण के लिए स्वच्छ जल में काले तिल मिलाकर पितरों के निमित्त जल अर्पित किया जाता है। नदी पर जाना संभव न हो तो घर पर भी परंपरा के अनुसार दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तर्पण किया जा सकता है।
जौ, चावल, काले तिल और दूध से पिंड तैयार कर पूर्वजों के नाम का स्मरण करते हुए उन्हें अर्पित करने की परंपरा बताई गई है।
पंचबलि और ब्राह्मण भोजन की परंपरा
श्राद्ध कर्म के बाद पंचबलि की परंपरा भी बताई गई है। इसमें गाय, कौआ, कुत्ता, चींटियों और देवताओं के निमित्त भोजन निकाला जाता है। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराने तथा सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा देने की परंपरा है।
अंत में पूर्वजों से क्षमा प्रार्थना करते हुए उन्हें विदा करने और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
पंचांग के अनुसार 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के बाद 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र की शुरुआत होगी।
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