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    28 साल की सेवा के बाद भी नहीं मिला हक? राजस्थान के कर्मचारी को अदालत से मिली राहत

    नई दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने राजस्थान के एक कॉन्ट्रैक्ट पर कार्य करने वाले दिहाड़ी मजदूर को मिलने वाले मुआवजे की रकम को पांच लाख रुपये से बढ़ाकर 7.5 लाख रुपये कर दिया है। आपको बता दें कि इस मजदूर ने अपनी नौकरी से अवैध रूप से निकाले जाने के बाद एक लंबी और संघर्षपूर्ण कानूनी लड़ाई लड़ी थी, जिसे गंभीरता से संज्ञान में लेते हुए शीर्ष अदालत ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हालांकि, उसे दोबारा नौकरी पर वापस नहीं रखा गया है।

    न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने यह आदेश कल्लू खान की अपील पर सुनवाई करते हुए पारित किया है। खान ने राजस्थान हाई कोर्ट के उस फैसले की समीक्षा (रिव्यू) करने से इनकार करने वाले आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उसे नौकरी पर वापस रखने और 50 प्रतिशत बकाया वेतन देने के बजाय पाँच लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश दिया गया था।

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?

    सुप्रीम कोर्ट ने यह पूरी तरह साफ कर दिया कि मुआवजे की इस राशि में की गई बढ़ोतरी इस मामले के विशेष और विशिष्ट तथ्यों को देखते हुए की गई है, इसलिए इसे भविष्य के लिए कोई नजीर (मिसाल) नहीं माना जाना चाहिए। जस्टिस भुइयां की अध्यक्षता वाली बेंच ने अपने आदेश में कहा, 'इस मुख्य बात को ध्यान में रखते हुए कि अपीलकर्ता 10 सितंबर, 1998 से ही लगातार कानूनी उपाय और लड़ाई लड़ रहा था, जिसका परिणाम 4 अगस्त, 2025 के आदेश के रूप में सामने आया और यह भी कि यदि उसे सेवा में वापस रखा जाता तो वह और तीन साल तक अपनी सेवाएँ देता, हमारी यह स्पष्ट राय है कि उसे 7,50,000 रुपये का मौद्रिक मुआवजा देना पूरी तरह से न्याय के हित में होगा।' सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ा निर्देश दिया कि यह बढ़ा हुआ मुआवजा अपीलकर्ता को एक महीने की समयावधि के भीतर प्रदान किया जाए।

    क्या है इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि?

    यह पूरा कानूनी विवाद कल्लू खान की एक कॉन्ट्रैक्ट आधारित दिहाड़ी मजदूर के रूप में नौकरी समाप्त किए जाने से जुड़ा हुआ है, जिसे उन्होंने 'इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947' की धारा 2A(2) के तहत विधिवत चुनौती दी थी। नौकरी से निकाले जाने के इस मामले को अदालत में चुनौती देने से पूर्व उन्होंने 19 नवंबर, 1990 से 1 सितंबर, 1998 तक अपनी सेवाएँ दी थीं।

    • लेबर कोर्ट का फैसला: श्रम न्यायालय (लेबर कोर्ट) ने 18 फरवरी, 2020 को अपने एक फैसले में उन्हें नौकरी पर वापस बहाल करने, सेवा की निरंतरता (कंटीन्यूअटी ऑफ सर्विस) बनाए रखने, पूरा बकाया वेतन (बैकवेजेज) तथा अन्य सभी संबंधित लाभ देने का सख्त निर्देश दिया था।

    • हाई कोर्ट का फैसला: हालांकि, जिला शिक्षा अधिकारी की तरफ से दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए, राजस्थान हाई कोर्ट की सिंगल जज बेंच ने 5 मार्च, 2021 को लेबर कोर्ट के फैसले में कुछ आंशिक बदलाव किए। उन्होंने नौकरी पर वापस रखने के निर्देश को तो बरकरार रखा, लेकिन बकाया वेतन को 100 प्रतिशत से घटाकर 50 प्रतिशत कर दिया।

    समीक्षा याचिका खारिज होने के बाद पहुँचे थे सुप्रीम कोर्ट

    इसके उपरांत, राजस्थान हाई कोर्ट की डिविजन बेंच ने 4 अगस्त, 2025 के एक आदेश के माध्यम से मजदूर को नौकरी पर वापस रखने के बजाय 'सर्विस की निरंतरता' और 50 प्रतिशत बकाया वेतन के एवज में पाँच लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का निर्देश पारित किया था। खान ने स्पेशल लीव पिटिशन (SLP) दायर करके सुप्रीम कोर्ट में इस उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी।

    तत्पश्चात 12 दिसंबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 136 के अंतर्गत उच्च न्यायालय के आदेश में तुरंत दखल देने से इनकार कर दिया था, लेकिन उन्हें कानून के दायरे में उपलब्ध उचित कानूनी उपाय अपनाने की पूरी छूट दे दी थी। इसके बाद उन्होंने राजस्थान हाई कोर्ट के आदेश की समीक्षा (रिव्यू) की मांग की। हालांकि, उच्च न्यायालय की डिविजन बेंच ने 11 फरवरी, 2026 को उनकी वह समीक्षा याचिका भी खारिज कर दी, जिसके चलते उन्हें न्याय के लिए एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

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