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    आर्थिक नीतियों को लेकर BJP और कांग्रेस में टकराव, खड़गे ने लगाया ‘आर्थिक आतंकवाद’ का आरोप

    नई दिल्ली: कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने शुक्रवार को नरेन्द्र मोदी सरकार पर देश की अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों में एकाधिकार (मोनोपोली) और चुनिंदा दो कंपनियों के दबदबे को लगातार बढ़ावा देने का गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि सरकार की वर्तमान आर्थिक नीतियां केवल कुछ चुनिंदा पूंजीपति समूहों के पक्ष में काम कर रही हैं, जिससे केवल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को राजनीतिक व आर्थिक फायदा पहुंच रहा है।

    खरगे ने भाजपा पर लगाया आर्थिक नीतियों से मुनाफा कमाने का गंभीर आरोप

    राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट के माध्यम से आरोप लगाया, "प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आर्थिक नीति का मुख्य उद्देश्य अपने पसंदीदा पूंजीपति मित्रों को पूरी अर्थव्यवस्था का नियंत्रण सौंपना है, ताकि इसके बदले में भाजपा अपने मुनाफे में एक बड़ा हिस्सा हमेशा बनाए रखे। देश में प्रतिस्पर्धा को पूरी तरह खत्म करके एकाधिकार और केवल दो कंपनियों के दबदबे वाली व्यवस्था को लागू कर इस सरकार ने सिर्फ और सिर्फ भाजपा का खजाना भरने का काम किया है और ऐतिहासिक आर्थिक उदारीकरण की मूल नींव को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है।"

    दूरसंचार और विमानन क्षेत्र का उदाहरण देकर सरकार को घेरा

    खरगे ने दूरसंचार (टेलीकॉम) क्षेत्र का सीधा उदाहरण देते हुए दावा किया कि वर्ष 2014 से पहले इस क्षेत्र में लगभग 13 प्रतिस्पर्धी कंपनियां थीं, जबकि वर्तमान समय में केवल तीन प्रमुख निजी कंपनियां ही इस बाजार में बची हैं। इसके अलावा उन्होंने घरेलू विमानन (एविएशन) क्षेत्र का भी विशेष रूप से जिक्र किया। उनके अनुसार, वर्ष 2014 से पहले देश के इस क्षेत्र में सात प्रमुख कंपनियां हुआ करती थीं, लेकिन अब इनकी संख्या घटकर केवल दो ही रह गई है।

    खरगे ने क्यों दिया इसे 'आर्थिक आतंकवाद' का नाम?

    उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, "चाहे डिजिटल भुगतान प्रणाली हो, सीमेंट उद्योग हो या फूड डिलीवरी ऐप्स हों, हर मोर्चे पर सरकार की एकमात्र प्राथमिकता बाजार से प्रतिस्पर्धा को समाप्त करने की रही है।" कांग्रेस अध्यक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि देश में ऐतिहासिक आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत कांग्रेस पार्टी ने की थी। उन्होंने कड़े शब्दों में आरोप लगाया कि भाजपा केवल अपने स्वार्थ के लिए ऐसी घातक नीतियां अपना रही है, जिसे उन्होंने सीधे तौर पर "आर्थिक आतंकवाद" (इकोनॉमिक टेररिज्म) करार दिया है।

    खरगे ने यह भी दावा किया कि सरकार की इन गलत नीतियों के कारण सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) तथा देश के अन्य छोटे और मध्यम उद्योगों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है। उन्होंने देश के युवाओं के बीच लगातार बढ़ रही गंभीर बेरोजगारी की स्थिति के लिए भी सीधे तौर पर केंद्र सरकार को ही पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया।

    अमेरिका के फैसले पर भी कांग्रेस सांसद जेबी माथेर ने उठाए बड़े सवाल

    इस बीच, शुक्रवार को ही कांग्रेस सांसद जेबी माथेर ने अमेरिकी सरकार की ओर से 'स्थায়ী श्रम प्रमाणन कार्यक्रम' (परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम – PERM) को अचानक निलंबित किए जाने और इसके प्रमुख भारतीय आईटी कंपनियों पर पड़ने वाले विपरीत प्रभावों को लेकर तीखे सवाल उठाए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि भारत के कई महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों पर अमेरिकी हितों का भारी प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने इस पूरे मुद्दे को यूपीआई (UPI) भुगतान शुल्क और कुछ चुनिंदा क्षेत्रों को दी गई विशेष छूट से भी जोड़कर देखा।

    क्या भारत की घरेलू नीतियों पर पड़ रहा है अमेरिका का असर?

    जेबी माथेर ने दावा किया कि जब भारत में यूपीआई और रुपे (RuPay) जैसे स्वदेशी भुगतान मंच तेजी से मजबूत हो रहे थे, तब अमेरिका ने भारत की इस स्वतंत्र भुगतान व्यवस्था को प्रभावित करने की पूरी कोशिश की थी। उन्होंने कहा कि शुरुआती दौर में मास्टरकार्ड और वीजा जैसी अमेरिकी कंपनियां ही वैश्विक भुगतान क्षेत्र में प्रमुख स्थान रखती थीं, लेकिन भारत में यूपीआई की अपार सफलता के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कथित तौर पर इस मामले में अपनी शर्तें तय करने का प्रयास किया था।

    उन्होंने आगे आरोप लगाते हुए कहा, "इसी के परिणामस्वरूप व्यक्तिगत उपयोग के अलावा अन्य व्यावसायिक लेनदेन पर यूपीआई भुगतान शुल्क लागू किया गया। साथ ही यह भी तय किया गया कि यह शुल्क कितना वसूला जाएगा। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि आखिर इसकी छूट किसे दी गई? दूरसंचार क्षेत्र को यह छूट मिली, और इस क्षेत्र में मुख्य रूप से कौन है? रिलायंस। इसी तरह बिजली क्षेत्र में छूट किसे प्रदान की गई? बिजली क्षेत्र का नेतृत्व अडाणी समूह कर रहा है। इसलिए यूपीआई के मामलों में हम स्पष्ट रूप से देख रहे हैं कि वहां से शर्तें तय की जाती हैं, जबकि यहां घरेलू स्तर पर कुछ चुनिंदा घरानों को विशेष रियायतें दी जा रही हैं।"

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