राजेंद्र सिंह, जलपुरुष
रामत्व के गुणों के कारण ही श्रीराम प्रकृति के संरक्षक और संस्कृति के नायक बने। उनके रामत्व ने ही उन्हें भगवान् का स्थान दिलाया। वे 14 वर्ष तक वनवास में प्रकृति के साथ रहे। केवल इतना ही नहीं, वे जीवनभर प्रकृति प्रेमी और संस्कृति निर्माता बने रहे। इसके विपरीत, रावण अपने रावणत्व के कारण राक्षस बना रहा। श्रीराम अहिंसक संस्कृति के संरक्षक और नायक थे तथा सत्यमय जीवन जीते थे, जबकि रावण प्रकृति और भारतीय संस्कृति का शत्रु था।
प्रकृति के बीच रहकर संस्कृति को समृद्ध बनाने वाले श्रीराम थे। दूसरी ओर, रावण अपनी बुद्धि, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से प्रकृति का खनन करके सोना निकालता था और अपनी अभियांत्रिकी से सोने की लंका बनाता था। वह मद, मोह, लालच, द्वेष, भय, घृणा और सबसे बड़ा होने के घमंड जैसे दस दोषों से युक्त था। वह कामी, भोगी और हिंसक था। उसकी प्रसिद्धि भारत के वनों तक फैली हुई थी। वह संस्कृति का नेतृत्व करने वाला नहीं, बल्कि वनवासियों को भयभीत करके रखने वाला था। कैकेयी को भी उसके आतंक के बारे में पता था। इसी कारण उसने राम को 14 वर्ष के वनवास पर जाने की तैयारी सहजता से करवा दी थी।
श्रीराम प्रकृति के अनुकूल जीवन जीते हुए माता सीता और छोटे भाई लक्ष्मण के साथ वनवास गए। वहाँ उन्होंने वनवासियों को रावण के आतंक से भयभीत देखा। श्रीराम वनों, वन्यजीवों और वनवासियों को भयमुक्त करने के लिए सभी को अपने स्नेह से जोड़ने और संस्कारित करने में जुट गए। प्रकृति के प्रति उनका दृष्टिकोण सभी को साथ लेकर चलने, समता, सादगी, सदाचार, स्नेह, पोषण और विश्वास पैदा करने वाला था।
लालच, मोह और मद से मुक्त जीवन जीना तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार सभी के लिए शुभ कर्म करना उनकी साधना थी। उन्होंने किसी को झूठ का सहारा लेकर धोखा नहीं दिया। वे क्रोधमुक्त, कर्मशील, परिश्रमी, अहंकाररहित और अहिंसा के मार्ग पर चलने वाले थे। वन्यजीवों को संगठित करके समुद्र पर पुल बनाकर उसे पार करना तथा सम्मानपूर्वक नाव से नदी पार करना भी उनके जीवन-व्यवहार का हिस्सा था।
श्रीराम ने प्रकृति के प्रति सम्मान रखते हुए जीवन जीने की योजना बनाई, जो आगे चलकर संस्कृति का आधार बनी। प्रकृति के पुनर्जनन के साथ श्रीराम अपने स्नेहपूर्ण और विश्वासपूर्ण जीवन-व्यवहार से हमारे संस्कारों का आधार बने। इसी से हमारी संस्कृति का सृजन हुआ।
प्रकृति संरक्षण से भारतीय संस्कृति का निर्माण
प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति और शास्त्रों के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई थी। वह ऐसा काल था, जब हम प्रकृति का संरक्षण करके संस्कृति और विद्या के गुरु बने थे। आज हम गुरु नहीं रहे, क्योंकि हमने जिस तेजी से प्रकृति का विनाश किया है, वैसा पहले किसी भी काल में नहीं हुआ था।
मानव अवतारों में सबसे पहले भगवान् श्रीराम ही थे। शिव भी मानव स्वरूप से जुड़े माने जाते हैं, लेकिन हम उन्हें लिंग के रूप में ही मानते हैं। राम संपूर्ण मानव थे, जिन्होंने मनुष्य की तरह ही जीवन जिया। उन्होंने प्रकृति को भगवान् माना और लोगों ने भी उन्हें भगवान् मान लिया।
इसके बाद द्वापर युग में गोपाल श्रीकृष्ण ने अपनी कलाकारी और अर्जुन के सारथी के रूप में अपनी भूमिका निभाई। श्रीकृष्ण को कमजोरों की मदद करने वाला मानकर भगवान् बना दिया गया। श्रीराम प्रकृति के संरक्षक भगवान् हैं, जबकि श्रीकृष्ण कमजोरों के रक्षक भगवान् हैं। श्रीकृष्ण लोगों को बाढ़ से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत का सहारा लेते हैं। हालाँकि, वे श्रीराम की तरह सरल, सीधे और सज्जन नहीं हैं, लेकिन राम के कुछ गुण उनमें भी हैं। इसलिए उन्हें श्रीराम का अंशावतार माना जाता है।
श्रीराम का वंश आगे तक चला। उन्होंने प्रकृति और संस्कृति, दोनों की रक्षा करके एक तरह से सनातन परंपरा को समृद्ध किया। सनातन विकास की प्रक्रिया सदैव चलती रहनी चाहिए। उसका कभी अंत नहीं होना चाहिए और न ही उसे कभी समाप्त होना चाहिए।
श्रीराम सनातन विकास की इस प्रक्रिया के प्रथम नायक हैं। आज भी लोग उन्हीं की परंपराओं और उनके द्वारा निर्मित संस्कृति को मानते हैं तथा उसे अपने जीवन में अपनाते हैं। इसके विपरीत, रावण को श्रीराम ने पूरी तरह नष्ट कर दिया था, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि विकास के नाम पर विनाशकारी संस्कृति आगे बढ़े। रावण जिस प्रकार का विकास कर रहा था, वह विनाशकारी संस्कृति को बढ़ावा दे रहा था। इसलिए श्रीराम ने रावण और उसकी संस्कृति का पूरी तरह विनाश कर दिया।
आज हम कह सकते हैं कि राम सनातन प्राकृतिक प्रक्रिया के निर्माता हैं, जबकि रावण उस प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न करके उसे नष्ट करने के प्रयास में लगा था। श्रीराम ने रावण की उस प्रक्रिया को रोक दिया था, लेकिन अब वही रावणीय प्रक्रिया भारत में बहुत तेजी से आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। इसका मूल कारण रावणत्व का प्रभावी होना है।
आधुनिक विकास और रावणत्व का प्रभाव
श्रीराम ने रावणत्व को नष्ट करके रामत्व की स्थापना की थी। लेकिन आज डेटा सेंटर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ऐसी ही कई अन्य चीजें रावणीय संस्कृति को बढ़ावा देने वाली प्रतीत होती हैं। इन प्रक्रियाओं को समझने के लिए रावणत्व और रामत्व के बीच के अंतर को निम्नलिखित सारणी के माध्यम से समझा जा सकता है।
रावणत्व और रामत्व : अंतर की सारणी
| क्र. | रावणत्व | रामत्व |
|---|---|---|
| 1. | मैं ही सबसे बड़ा हूँ। | सभी को साथ लेकर चलने की भावना — समता। |
| 2. | काम और भोग में लिप्त रहना। | राज-भोग का त्याग करके वनवास स्वीकार करना — सहजता। |
| 3. | क्रोध। | युद्ध में भी क्रोध को प्रधानता न देकर केवल साध्य को साधने पर ध्यान देना। |
| 4. | मद तथा विज्ञान और ज्ञान का घमंड। | तकनीकी, अभियांत्रिकी, विज्ञान और ज्ञान का उपयोग सभी के शुभ एवं कल्याण के लिए करना तथा सादगी से जीवन जीना — सादगी। |
| 5. | मोह — सभी कुछ मेरे लिए है। | सभी को स्नेह से सिंचित और पोषित करना। |
| 6. | लोभ। | अपने सुख के लिए कुछ भी न चाहना, लोभ से मुक्त रहना और शुभ कर्म करना। |
| 7. | अहंकार। | अहंकार से मुक्त रहकर सरलता, सादगी और सहजता से बंदर, भालू, रीछ और जटायु जैसे वन्यजीवों को अपना मित्र बनाना तथा संस्कृति की रक्षा के लिए प्रकृतिमय जीवन जीना। |
| 8. | घृणा और द्वेष। | किसी से द्वेष या घृणा न करना तथा शत्रु को भी धोखा न देना। |
| 9. | भय। | निर्भय और निर्वैर रहना। |
| 10. | हिंसा। | हिंसामुक्त जीवन जीना। शत्रु के विरुद्ध भी केवल साध्य को साधने के उद्देश्य से, रावण की नाभि में स्थित दसों दोषों से मुक्ति दिलाने के लिए नाभि-भेदन करना। प्रकृति के अनुरूप संस्कृति की रक्षा करके विजय प्राप्त करना और सब कुछ उसे ही सौंप देना, ताकि प्रकृति और संस्कृति का संरक्षण हो सके। |


