दादा की इच्छा, पोते का संकल्प बनी : 1965 में शुरू हुआ सेवा का कारवां आज भी जारी, मरीजों की जांच से लेकर ऑपरेशन, दवा और चश्मे तक का खर्च उठाता है ट्रस्ट
नौगांवा की जानकारी के लिए इस लिंक को भी खोलकर सुनना चाहिए। https://youtu.be/scwfsRn1bwg?si=yjOZkNnH55CWvDSI

विपिन मेहंदीरत्ता, मिशन सच नौगांवा ।
किसी की जिंदगी में उजाला लाने के लिए सिर्फ रोशनी की जरूरत नहीं, बल्कि सेवा का संकल्प भी चाहिए। इसी संकल्प को छह दशक से साकार कर रहा है ठंडीराम प्रेमचंद जैन चैरिटेबल ट्रस्ट। ट्रस्ट ने अब तक करीब 10 हजार से अधिक लोगों की आंखों की रोशनी लौटाने में मदद की है। वर्ष 1965 में शुरू हुई यह सेवा आज भी निरंतर जारी है। ट्रस्ट की ओर से हर साल दो बार नि:शुल्क नेत्र चिकित्सा शिविर लगाए जाते हैं, जिनमें जरूरतमंद मरीजों की जांच से लेकर ऑपरेशन, दवा और चश्मे तक की व्यवस्था की जाती है। ट्रस्ट की यह पहल उन लोगों के लिए उम्मीद की किरण बनी हुई है, जिनके लिए आंखों का इलाज कराना आर्थिक रूप से मुश्किल होता है। खास बात यह है कि सेवा के इस कार्य में ट्रस्ट सरकारी अनुदान भी नहीं लेता। जरूरतमंदों की आंखों का इलाज कराने से लेकर उन्हें दोबारा सामान्य जीवन जीने में मदद करने तक का खर्च ट्रस्ट स्वयं वहन करता है।
दादा के विचारों को पोते ने बनाया सेवा का संकल्प

ट्रस्ट के संचालक सुरेंद्र जैन के अनुसार, उनके दादा ठंडीराम जैन और पिता प्रेमचंद जैन धर्मपरायण और सेवाभावी व्यक्ति थे। दादा के मन में विचार आया कि जब तक इंसान जीवित है, तब तक उसे अपनी आंखों से दुनिया देखते रहना चाहिए। वह किसी पर निर्भर रहने के बजाय अपना काम खुद कर सके, यही सबसे बड़ी आत्मनिर्भरता है। इसी सोच के साथ वर्ष 1965 में ठंडीराम जैन ने अपने खर्च पर नौगांवा में पहला नेत्र जांच एवं ऑपरेशन शिविर शुरू कराया। उस दौर में ग्रामीण क्षेत्रों में आंखों के इलाज की सुविधाएं सीमित थीं। ऐसे में जरूरतमंद मरीजों को उपचार उपलब्ध कराना अपने आप में बड़ी पहल थी। धीरे-धीरे यह प्रयास सेवा की ऐसी परंपरा बन गया, जो आज छह दशक बाद भी हजारों लोगों के लिए लाभकारी साबित हो रहा है।
जांच से ऑपरेशन तक, मरीज पर नहीं पड़ने देते आर्थिक बोझ

ट्रस्ट की सेवा केवल आंखों की जांच तक सीमित नहीं है। शिविर में जांच के बाद जिन मरीजों को ऑपरेशन की जरूरत होती है, उन्हें आगे के उपचार के लिए व्यवस्था उपलब्ध कराई जाती है। जरूरत के अनुसार ऑपरेशन, दवाइयों और चश्मे का खर्च भी ट्रस्ट उठाता है। ट्रस्ट की ओर से जरूरतमंद मरीजों को नौगांवा से अलवर लाने और उपचार के बाद वापस पहुंचाने के लिए बस की व्यवस्था भी की जाती है। इससे उन मरीजों को राहत मिलती है, जिनके पास इलाज के लिए अस्पताल तक पहुंचने के साधन या पर्याप्त पैसे नहीं होते।
साल में दो बार लगता है शिविर
ट्रस्ट की ओर से हर साल मार्च और सितंबर में नेत्र चिकित्सा शिविर आयोजित किए जाते हैं। वर्ष 2010 तक नौगांवा में ही शिविर स्थल पर ऑपरेशन किए जाते थे। इसके बाद चयनित मरीजों के ऑपरेशन सामान्य अस्पताल में कराए जाने लगे।इस व्यवस्था का उद्देश्य जरूरतमंद लोगों तक समय पर उपचार पहुंचाना और उन्हें बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना है। ग्रामीण अंचल के बुजुर्गों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए ऐसे शिविर विशेष महत्व रखते हैं।
सेवा की असली सफलता, जब मरीज फिर देख पाता है दुनिया
आंखों की रोशनी लौटना किसी व्यक्ति के लिए केवल बीमारी से राहत पाना नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की ओर लौटना भी है। जिस बुजुर्ग को दूसरों के सहारे चलना पड़ता हो, वह दोबारा अपने काम खुद कर सके; जिस व्यक्ति को परिवार के सदस्यों के चेहरे साफ दिखाई न देते हों, वह फिर से उन्हें देख सके,यही इस सेवा की सबसे बड़ी उपलब्धि है। ठंडीराम प्रेमचंद जैन चैरिटेबल ट्रस्ट की छह दशक लंबी यात्रा बताती है कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए बड़े संसाधनों से ज्यादा जरूरी है सेवा का भाव और उसे लगातार निभाने का संकल्प। करीब 10 हजार से अधिक लोगों की आंखों में रोशनी लौटाने में योगदान देने वाला यह प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा है।
26 अक्टूबर को लगे शिविर की डिटेल पढ़ने के लिए इस लिंक को खोले https://missionsach.com/%E0%A4%A8%E0%A5%8C%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-300-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%9C%E0%A5%8B.html
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