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    मध्य प्रदेश के इस गांव में बहती है दूध की गंगा! डेली सवा 2 लाख रुपए की होती है इनकम

    बुरहानपुर: मध्य प्रदेश में एक ऐसा भी गांव है जहां हर परिवार गाय भैंस पालता है, गांव का नाम झिरी जरुर है लेकिन अब इसे इस नाम से कम बल्कि दूध वाले गांव के नाम से ज्यादा जाना जाता है. बुरहानपुर से महज 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्राम पंचायत झिरी के 2 गांवों में प्रतिदिन दूध का इतना उत्पादन होता है कि लोग कहने लगे हैं कि यहां तो दूध की गंगा बहती है.

    झिरी और झांझर में चारण समाज के 150 परिवार रहते हैं. इनका मुख्य व्यवसाय पशु पालन है. खास बात यह है कि इन गांवों को आज दूध वाला गांव के नाम से ही पहचाना जाता है. यहां से रोजाना 5 हजार लीटर दूध की सप्लाई होती है. यही वजह है कि पशुपालन व्यवसाय ने ग्रामीणों को आर्थिक रूप से संपन्न बना दिया है.

    गांव में बेस्ट क्वालिटी का मिलता है दूध

    झिरी और झांझर गांव में प्योर दूध मिलता है अधिकांश पशुपालकों के मवेशी जंगल में चरने जाते हैं. इससे दूध की गुणवत्ता अच्छी रहती है. जिले भर में यहीं से दूध सप्लाई होता है. हालांकि, बढ़ती महंगाई के दौर में पशुपालन करना जटिल समस्या बन गई हैं, जो पशुपालक बाड़े में ही मवेशी पालन करते हैं. उनके सामने मवेशियों की खुराक बड़ी समस्या बन चुकी है.

    परिवारों की हो रही अच्छी खासी इनकम

    पशुपालक रामा जीवा बताते हैं कि "12 रुपए किलो का चारा खिलाते हैं. मवेशियों का खाद्य पदार्थ खली और अन्य सामग्री महंगी हो गई है. इससे कई युवाओं ने पशुपालन से तौबा कर लिया है. उन्होंने दूसरे रोजगार की तरफ रुख अपनाया है." ग्राम पंचायत झिरी के अंतर्गत 3 गांव आते हैं. यहां कुल 370 परिवार निवास करते हैं. जिनमें चारण समाज के 150 परिवार शामिल हैं. इन परिवारों में से अधिकांश परिवारों ने पशुपालन को अपनी आजीविका का मुख्य साधन बनाया है.

    सवा 2 लाख रुपये की होती है आय

    यहां के पशुपालक प्रतिदिन लगभग 5000 लीटर दूध का उत्पादन करते हैं, जिससे उन्हें रोजाना करीब सवा 2 लाख रुपये की आय होती है. चारण समाज के लोग पारंपरिक रूप से पशुपालन में निपुण रहे हैं. इस गांव में उनकी मौजूदगी ने दुग्ध उत्पादन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है. गांव के पशुपालक गाय, भैंस और अन्य दुधारू पशुओं का पालन करते हैं. हालांकि अब उन्हें महंगाई से जूझना पड़ रहा है. उन्होंने दूध की कीमतें बढ़ाने की मांग की है. रोचक बात यह है कि चारण समाज के पशुपालकों द्वारा उत्पादित दूध स्थानीय बाजारों के साथ-साथ डेयरी सहकारी समितियों को भी आपूर्ति किया जाता है.

    गांव वाले सदियों से कर रहे दूध का व्यवसाय

    यह गांव इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि कैसे पारंपरिक व्यवसाय को अपनाकर ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक समृद्धि लाई जा सकती है. पशु पालक रामा जीवा की मांग है कि "उनके दूध का मूल्य निर्धारण किया जाना चाहिए. क्योंकि पशुपालन पर उनका परिवार निर्भर है. पूरे गांव के लोगों का दूध व्यवसाय ही केवल आय का साधन है. दूध व्यवसाय ने इन परिवारों को न केवल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया था, बल्कि रोजगार के अवसर भी पैदा किए है. नई पीढ़ी इससे जुड़ी रहे, इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाने की जरूरत हैं."

    धूमिल हो रही दूध वाले गांव की पहचान

    झांझर गांव के पशुपालक वाला जीवा बताते हैं कि "आज भी गांव में हजारों पशु हैं. यहां से रोजाना 10 हजार लीटर दूध सप्लाई होता था, लेकिन अब उत्पादन घट रहा है. वर्तमान में 5 हजार लीटर दूध की सप्लाई बची है. इस गांव की पहचान दूध वाला गांव के नाम से बनी हुई है, जो धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है. हमारे गांव में शुद्ध दूध मिलता है. अब हमारे व्यवसाय को बनाये रखने के लिए सरकार को कदम उठाना चाहिए. ताकि युवा पीढ़ी में इस व्यवसाय को जीवंत रख सकें."

     

     

      गांव में बहती हैं दूध की नदियां

      ग्राम पंचायत झिरी की सरपंच आशा कैथवास ने कहा, "झांझर और झिरी गांव में 150 पशु पालकों के पास हजारों पशु हैं. यहां प्योर दूध मिलता है. इससे ग्रामीणों के जीवन में बड़ा बदलाव हुआ है. पूरे जिले में हमारा गांव दूध वाला गांव के नाम से प्रसिद्ध है. अधिकांश पशुपालकों की गाय और भैंस जंगलों में चरने जाती हैं. इससे बेहतर गुणवत्ता का दूध निकलता है, इस गांव में दूध की गंगा बहती है."

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