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    अमेरिका ने भारत से केवल अतिरिक्त रूसी तेल की खरीद न करने की प्रतिबद्धता हासिल की- रुबियो

    व्यापार समझौते पर अमेरिका ने दिया स्पष्टीकरण, ऊर्जा नीति में स्वायत्तता बरकरार

    म्यूनिख। भारत और अमेरिका के बीच हालिया व्यापार समझौते को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रही अटकलों पर अब विराम लग गया है। रक्षा और कूटनीतिक हलकों में यह चर्चा थी कि इस डील के बदले अमेरिका ने भारत पर रूस से तेल खरीद बंद करने का दबाव बनाया है। हालांकि, Munich Security Conference के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के बयान और भारत के स्पष्ट रुख ने इन दावों को खारिज कर दिया है।

    रूबियो ने वैश्विक नेताओं को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि अमेरिका ने भारत से केवल “अतिरिक्त” रूसी तेल की खरीद न बढ़ाने की प्रतिबद्धता की बात की है। ‘अतिरिक्त’ शब्द यहां बेहद महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि भारत वर्तमान में जितना तेल रूस से आयात कर रहा है, उसे रोकने या कम करने की कोई शर्त इस समझौते में शामिल नहीं है। यह बयान भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता की अप्रत्यक्ष स्वीकृति के रूप में देखा जा रहा है।

    भारत की ओर से विदेश मंत्री एस. जयशंकर पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि देश की ऊर्जा नीति लागत, उपलब्धता और जोखिम प्रबंधन पर आधारित है, न कि किसी बाहरी राजनीतिक दबाव पर। आंकड़ों के अनुसार 2025 के मध्य में भारत का रूसी तेल आयात लगभग 20 लाख बैरल प्रतिदिन था, जो हाल के महीनों में घटकर करीब 12 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया है। हालांकि यह कमी किसी दबाव का परिणाम नहीं, बल्कि ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण की रणनीति का हिस्सा है।

    भारत अब अमेरिका और वेनेजुएला जैसे अन्य देशों से भी ऊर्जा आयात के विकल्प तलाश रहा है, लेकिन इसका अर्थ रूस से पूरी तरह दूरी बनाना नहीं है। सस्ता रूसी तेल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ घरेलू महंगाई को नियंत्रित रखने में भी सहायक है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में भारत-अमेरिका संबंधों में व्यापार और ऊर्जा सहयोग को प्राथमिकता दी जा रही है। सम्मेलन में यूक्रेन युद्ध का उल्लेख करते हुए रूबियो ने कहा कि रूस ने संघर्ष समाप्त करने की इच्छा जताई है, लेकिन परिस्थितियां अब भी जटिल हैं। अमेरिका जहां रूस पर प्रतिबंधों का दबाव बनाए रखना चाहता है, वहीं वह भारत जैसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार की ऊर्जा आवश्यकताओं को भी समझता है।

    समग्र रूप से यह घटनाक्रम दर्शाता है कि भारत वैश्विक शक्ति संतुलन के बीच अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता दोनों को संतुलित करने में सफल रहा है।

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