More
    Homeदुनियाजंग का असर: अब सस्ता नहीं महंगा तेल बेचेंगे पुतिन, भारत के...

    जंग का असर: अब सस्ता नहीं महंगा तेल बेचेंगे पुतिन, भारत के लिए बढ़ेगी मुश्किलें

    मॉस्को। मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में जारी भीषण संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य में उत्पन्न अस्थिरता ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल का सबसे बड़ा असर भारत की तेल आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ा है। पिछले चार वर्षों से भारत के लिए संकटमोचक बना सस्ता रूसी तेल अब अपनी चमक खोने लगा है। ताज़ा रिपोर्ट्स के अनुसार, रूसी तेल पर मिलने वाला सेंक्शन डिस्काउंट (प्रतिबंधों के कारण मिलने वाली छूट) अब स्कैरसिटी प्रीमियम यानी किल्लत की ऊंची कीमत में तब्दील हो गया है। स्थिति यह है कि अब भारत को रूसी तेल अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड की तुलना में भी महंगा मिल रहा है।
    भारत के लिए यह बदलाव एक गंभीर आर्थिक संकट का संकेत है। कोरोना काल के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था को संभालने और राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने में सस्ते रूसी तेल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अब जबकि यूराल्स तेल अंतरराष्ट्रीय दरों को पार कर गया है और ब्रेंट क्रूड खुद 92 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच चुका है, घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को स्थिर रखना सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी। इस स्थिति का सीधा असर भारतीय रुपये की वैल्यू और मुद्रास्फीति पर पड़ना तय माना जा रहा है।
    वर्ष 2022 में यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के समय रूस भारत को प्रति बैरल 15 से 30 डॉलर तक की भारी छूट दे रहा था, लेकिन मार्च और अप्रैल 2026 की डिलीवरी के लिए बाजार के हालात बिल्कुल उलट चुके हैं। अब रूसी तेल ब्रेंट क्रूड से भी लगभग 4-5 डॉलर प्रति बैरल महंगा मिल रहा है। इस मूल्य वृद्धि के पीछे मुख्य कारण खाड़ी देशों से आने वाले तेल का युद्ध के कारण रास्ते में फंसना है। लगभग 14 लाख बैरल तेल की आपूर्ति बाधित होने से भारतीय रिफाइनरियां अपनी अनिवार्य जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस की ओर रुख कर रही हैं, जिसका लाभ उठाते हुए रूसी निर्यातकों ने कीमतें बढ़ा दी हैं।इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका की विरोधाभासी तेल कूटनीति ने भी आग में घी डालने का काम किया है। पहले भारत-रूस तेल व्यापार पर आपत्ति जताने वाला अमेरिका अब वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें संतुलित करने के लिए भारत से रूसी तेल खरीदने की गुजारिश कर रहा है। जैसे ही यह संकेत मिला कि पश्चिम को रूसी तेल की आपूर्ति की आवश्यकता है, रूसी निर्यातकों ने मौके का फायदा उठाते हुए दरों में भारी इजाफा कर दिया। इसके अलावा, रसद और परिवहन की समस्याओं ने भी लागत को आसमान पर पहुंचा दिया है। मध्य पूर्व में तनाव के कारण जहाजों को केप ऑफ गुड होप यानी अफ्रीका के नीचे से लंबा चक्कर लगाकर आना पड़ रहा है, जिससे समुद्री बीमा और माल ढुलाई का खर्च कई गुना बढ़ गया है।
     

    latest articles

    explore more

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here