12 मार्च को मनाया जाएगा जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर का जन्म कल्याणक
उदयभान जैन, जयपुर। जैन धर्म में वर्तमान चौबीसी के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव को भारतीय संस्कृति का आद्य प्रणेता माना जाता है। जैन परंपरा के अनुसार जैन धर्म अनादि और शाश्वत है तथा प्रत्येक कालचक्र में चौबीस तीर्थंकर होते हैं—भूतकाल में भी हुए, वर्तमान में भी हैं और भविष्य में भी होंगे। वर्तमान चौबीसी में भगवान ऋषभदेव प्रथम तीर्थंकर के रूप में पूज्य हैं।
जैन ग्रंथों के अनुसार भगवान ऋषभदेव का जन्म अयोध्या में इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय परिवार में महाराजा नाभिराय और माता मरुदेवी के यहां हुआ। उन्हें वृषभदेव, आदिनाथ, ऋषभदेव और पुरुदेव जैसे नामों से भी जाना जाता है। भगवान ऋषभदेव को जैन धर्म का प्रथम तीर्थंकर होने के साथ-साथ मानव सभ्यता को व्यवस्थित जीवन का मार्ग दिखाने वाला महान व्यक्तित्व माना जाता है।
परिवार और वंश परंपरा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान ऋषभदेव का विवाह नंदा और सुनंदा से हुआ। उनके 101 पुत्र और 2 पुत्रियां थीं। उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती थे, जिनके नाम पर इस देश का नाम “भारत” पड़ा। दूसरे पुत्र बाहुबली महान तपस्वी, पराक्रमी राजा और त्याग के प्रतीक माने जाते हैं।
उनकी दो पुत्रियां ब्राह्मी और सुंदरी थीं। भगवान ऋषभदेव ने ब्राह्मी को लिपि विद्या और सुंदरी को अंक विद्या का ज्ञान दिया। माना जाता है कि ब्राह्मी लिपि का नाम भी ब्राह्मी से ही जुड़ा हुआ है और सुंदरी को दी गई अंक विद्या गणितीय ज्ञान का मूल आधार मानी जाती है।
मानव समाज को दी जीवनोपयोगी शिक्षाएं
जैन परंपरा के अनुसार प्रारंभिक काल में कल्पवृक्षों के प्रभाव से मनुष्यों को भोजन और जीवनोपयोगी वस्तुएं सहज ही प्राप्त हो जाती थीं। लेकिन जब कल्पवृक्षों का प्रभाव समाप्त होने लगा, तब लोगों के सामने जीवनयापन की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई।
इस स्थिति में प्रजा ने भगवान ऋषभदेव से मार्गदर्शन मांगा। तब भगवान ऋषभदेव ने मानव समाज को छह प्रमुख जीवनोपयोगी विद्याओं का उपदेश दिया—असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प कला।
असि के माध्यम से उन्होंने शस्त्र विद्या, शासन व्यवस्था और समाज की सुरक्षा के सिद्धांत बताए।
मसि के माध्यम से लिपि विद्या और अंक विद्या का ज्ञान दिया, जिससे लेखन और गणना की परंपरा विकसित हुई।
कृषि के माध्यम से अन्न उत्पादन और शाकाहार की परंपरा का प्रवर्तन किया तथा खेती करने के तरीके बताए।
विद्या के माध्यम से शिक्षा और ज्ञान के महत्व को स्थापित किया।
वाणिज्य के माध्यम से व्यापार, क्रय-विक्रय और आर्थिक गतिविधियों का मार्ग बताया।
शिल्प कला के माध्यम से भवन निर्माण, मंदिर निर्माण और अन्य कलाओं का ज्ञान दिया।
इन शिक्षाओं के माध्यम से भगवान ऋषभदेव ने मानव समाज को जीवनयापन के साधन प्रदान किए, जो आज भी समाज की प्रगति का आधार बने हुए हैं।
अहिंसा और संयम का संदेश
भगवान ऋषभदेव ने केवल भौतिक विकास का मार्ग ही नहीं बताया, बल्कि समाज को आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग भी दिखाया। उन्होंने अहिंसा, संयम और तप का उपदेश देकर मानव जीवन को नैतिकता और आध्यात्मिकता से जोड़ने का कार्य किया।
अंततः भगवान ऋषभदेव ने राज वैभव, राज्य और परिवार का त्याग कर मुनि दीक्षा ग्रहण की। उन्होंने कठोर तप और साधना के माध्यम से आत्मकल्याण का मार्ग अपनाया और अंततः मोक्ष को प्राप्त हुए।
जन्म कल्याणक पर होंगे धार्मिक कार्यक्रम
जैन समाज में भगवान ऋषभदेव का जन्म कल्याणक अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष उनका जन्म कल्याणक 12 मार्च को चैत्र बदी नवमी के दिन मनाया जाएगा।
इस अवसर पर देश और विदेश में जैन समाज की विभिन्न संस्थाएं, मंदिर समितियां, युवा परिषद, महिला मंडल और अन्य संगठन अपने-अपने क्षेत्रों में धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करेंगे। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, अभिषेक, प्रवचन और धार्मिक सभाओं का आयोजन किया जाएगा।
अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री उदयभान जैन ने केंद्र और राज्य सरकारों से मांग की है कि भगवान ऋषभदेव जन्म कल्याणक के अवसर पर 12 मार्च को अवकाश घोषित किया जाए तथा राष्ट्रीय स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए जाएं, ताकि भगवान ऋषभदेव के जीवन, उनके अहिंसा सिद्धांतों और मानवता के लिए दिए गए योगदान को व्यापक स्तर पर जन-जन तक पहुंचाया जा सके।
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