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    सरिस्का CTH विस्तार पर उठे सवाल

    CTH प्रस्ताव को लेकर वन अधिकारों और कानूनी प्रक्रिया पर आपत्तियां तेज

    अलवर। जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में आयोजित परामर्श बैठक में सरिस्का वन्यजीव अभयारण्य के क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट (CTH) विस्तार प्रस्ताव को लेकर नागरिकों ने गंभीर चिंताएं व्यक्त कीं। यह बैठक राजस्थान सरकार के वन विभाग द्वारा 10 नवंबर 2025 को जारी अधिसूचना के संदर्भ में आयोजित की गई थी।

    अधिसूचना के अनुसार, सरिस्का में लगभग 44,238.99 हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र को शामिल करने का प्रस्ताव है, जिससे कुल CTH क्षेत्र बढ़कर लगभग 98,762.15 हेक्टेयर हो जाएगा। इस विस्तार में बीनक, कालीखोल, ददिकर, सिरावास, सईदावास, भानगढ़, अजबगढ़, रामपुरा श्रृंखला और सिलीबावड़ी जैसे वन क्षेत्र और राजस्व गांव शामिल हैं।

    पीपल फॉर अरावली की संस्थापक सदस्य नीलम अहलूवालिया ने सार्वजनिक सुनवाई में कहा कि यह अधिसूचना वन अधिकार अधिनियम 2006 (FRA) के प्रावधानों का उल्लंघन करती है। उन्होंने बताया कि FRA की धारा 4(2) के अनुसार वनवासियों को उनके अधिकारों के निर्धारण से पहले विस्थापित नहीं किया जा सकता, जबकि इस अधिसूचना में ग्राम सभाओं की सहमति और अधिकारों के निपटान का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।

    उन्होंने यह भी कहा कि अधिसूचना में यह प्रमाणित नहीं किया गया है कि मानव और वन्यजीवों के सह-अस्तित्व की संभावना समाप्त हो चुकी है, जबकि यह FRA के तहत आवश्यक शर्त है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वन अधिकारों का पूर्ण निपटान किए बिना CTH का विस्तार कानूनी रूप से अस्थिर है।

    5 जनवरी 2026 को अतिरिक्त उपखंड मजिस्ट्रेट कार्यालय, अलवर में दायर आपत्ति पत्र में भी इस प्रस्ताव को पारिस्थितिक और कानूनी रूप से अनुचित बताया गया। इसमें कहा गया कि बिना गांव-वार प्रभाव आकलन, आजीविका और पुनर्वास योजनाओं के इस प्रकार का विस्तार संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है।

    सीकर के पर्यावरणविद् कैलाश मीना ने कहा कि प्रस्तावित अधिसूचना से पहले से बंद खदानों के दोबारा शुरू होने का खतरा है, जिससे क्षेत्र की पारिस्थितिक संतुलन और सामाजिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

    गौरतलब है कि इससे पहले राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और राज्य स्तर पर भी इस मुद्दे को लेकर आपत्तियां उठ चुकी हैं। मामले को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में याचिका भी दायर की गई थी, जिस पर भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने 8 सितंबर 2025 को प्रस्ताव को वापस भेजते हुए उचित प्रक्रिया और सार्वजनिक परामर्श की आवश्यकता पर जोर दिया था।

    यह पूरा मामला सरिस्का की सीमाओं के पुनर्निर्धारण को लेकर बढ़ते जनविरोध का संकेत देता है, जिसमें स्थानीय समुदाय, पर्यावरणविद् और सामाजिक संगठन सक्रिय रूप से अपनी आपत्तियां दर्ज करा रहे हैं।

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