अलवर में अहिंसा सर्किल पर विशाल धरना, महिलाओं ने भी भाग लिया
अलवर । शहर के मन्नी का बड़ स्थित अहिंसा सर्किल पर गुरुवार सुबह दिगंबर जैन महासमिति, अलवर संभाग के आह्वान पर नीलगाय हत्या संबंधी कानून को वापस लेने की मांग को लेकर विशाल धरना-प्रदर्शन आयोजित किया गया। धरने में सर्वसमाज के अनेक संगठनों, महिलाओं, युवाओं और किसानों ने भाग लेकर सरकार के खिलाफ एकजुटता दिखाई और चेतावनी दी कि जब तक यह कानून वापस नहीं लिया जाएगा, आंदोलन तेज होता जाएगा।
धरने में शामिल महिला-पुरुषों ने काली पट्टी बांधकर विरोध दर्ज कराया। वक्ताओं ने कहा कि यह सिर्फ एक समाज का नहीं, बल्कि पूरे समाज और प्रकृति संरक्षण से जुड़ा मुद्दा है। धरने की विशेष बात यह रही कि इसमें तीन किसान संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया, जिनके नाम पर सरकार ने वर्षों पहले यह अधिसूचना जारी की थी। किसान नेताओं ने साफ कहा कि उन्होंने कभी भी नीलगाय को मारने की अनुमति देने जैसी कोई मांग सरकार से नहीं की थी। महासमिति के अलवर संभाग के अध्यक्ष कुलदीप कुमार जैन बडजात्या ने बताया कि नीलगाय के कानून पर इस सफल धरने ने यह साबित कर दिया है कि आम आदमी इस मुददे पर सरकार के खिलाफ है।
वक्ताओं ने बताया कि मार्च 1994 में राज्य सरकार ने नीलगाय को फसलों के लिए हानिकारक बताते हुए कुछ जिलों में उसे मारने की अनुमति दी थी। इसके बाद 1996 में इसका दायरा बढ़ाया गया और 31 अगस्त 2000 को पूरे राजस्थान में थाना प्रभारी से लेकर जिला कलेक्टर तक को अनुमति देने का अधिकार दे दिया गया। हालांकि, पिछले लगभग 30 वर्षों में एक भी किसान द्वारा अनुमति लेने या एक भी वैध शिकार का मामला सामने नहीं आया है। यह तथ्य स्वयं सरकार के मंत्री सार्वजनिक मंचों से स्वीकार कर चुके हैं।
आज सुबह 9 बजे शुरू हुए इस धरन में जहां जैन समाज के नर-नारियों ने हिस्सा लिया वहीं विश्व हिन्दू परिषद बजरंग दल सहित जैन समाजों के पदाधिकारी,चिकित्सक, पत्रकार, किसान नेता, व्यापारिक संगठनों के प्रतिनिधि आदि भी शामिल हुए। धरने पर बैठे महिला-पुरूषों ने काले बैज लगाये हुए थे। इस मौके पर वक्ताओं ने कहा कि फसल रक्षा के नाम पर सरकार ने जिस तरह ये कानून बनाया है उसमें पिछले करीब 3 दशक में एक भी ऐसा मामला नहीं आया जिसमें किसी किसान ने अपनी फसल बचाने के लिये सरकार से नील गाय की हत्या की परमिशन मांगी हो, तो फिर इस कानून का अर्थ क्या है। वक्ताओं ने कहा कि इस कानून की आड़ में मीट लॉबी अपना काम कर रही है और गायों की तथा राम की भक्त होने का दावा करने वाली भाजपा सरकार नील गायों की हत्या संबंधी कानून को वापिस नहीं ले रही है।
नील गाय रक्षा आंदोलन से जुड़े ओमप्रकाश गुप्ता ने नील गाय रक्षा को लेकर चलाये जा रहे आंदोलन के बारे में जानकारी दी और कहा कि सरकार से बार-बार गुहार करने के बावजूद भी सरकार इस कानून को वापिस नहीं ले रही है। धरने पर बैठे लोगों ने सरकार को इस बात के लिये कोसा कि आखिर सरकार इस कानून से किसानों का क्या भला करना चाहती है। सरकार अगर किसानों का भला करना चाहती है तो उन किसानों को मुआवजा दे जिन किसानों की फसल को वन्य जीव नष्ट कर देते हैं लेकिन सरकार का निशाना सिर्फ नील गाय ही क्यों है। वक्ताओं ने मांग रखी कि सरकार तुरन्त प्रभाव से इस कानून को वापिस ले। धरने को सरला जैन,राजेश रवि, वीरेन्द्र चौधरी,डॉ. एस.सी. मित्तल, डॉ. के.के.गुप्ता,भूपतसिंह बाल्याण, हरमीत सिंह, बच्चू सिंह, प्रमुख कवि कमलेश जैन बसंत, राज गुप्ता, भोलाराम, राजकुमार बख्शी आदि ने संबोधित किया। इस मौके पर अशोक जैन अगोनिज, कुलदीप बडज़ात्या, ललित बेनीवाल, हरीश जैन पत्रकार,अशोक पालावत, मगन चन्द जैन, मुकेश कुमार, हार्डवेयर वाले, राजेन्द्र जैन एडवोकेट,चंदन जैन एडवोकेट, संजय भारद्वाज, ज्ञानचन्द जैन, राजकुमार जैन, योगेश पालावत आदि ने मुख्य रूप से भाग लिया। धरने के दौरान सरकार को चेतावनी दी गई कि अगर सरकार ने जनता की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए नील गाय हत्या संबंधी कानून को तुरन्त वापिस नहीं लिया तो आंदोलन को जारी रखा जायेगा। धरने पर हस्ताक्षर अभियान भी चलाया गया और इन हस्ताक्षरों को ज्ञापन के साथ सरकार को उच्च स्तर पर भेजा जायेगा।
धरना स्थल पर आयोजित सभा में वक्ताओं ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि इस कानून का कोई उपयोग ही नहीं हुआ, तो इसे अब तक समाप्त क्यों नहीं किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि यह आदेश किसानों के हित में नहीं, बल्कि राजनीतिक कारणों से जिंदा रखा गया है। पर्यावरण, संवैधानिक मूल्यों और जनभावनाओं के विपरीत होने के बावजूद सरकार इसे वापस लेने में हिचक रही है।
धरने में यह भी उल्लेख किया गया कि हाल ही में राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को इस विषय में पत्र लिखा था, जिस पर केंद्र के संयुक्त निदेशक ने राज्य सरकार से जवाब भी मांगा, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है।
वक्ताओं ने बताया कि पिछले तीन दशकों में इस अधिसूचना को वापस लेने के लिए प्रदेशभर में हजारों ज्ञापन दिए जा चुके हैं। संत समाज, सामाजिक संगठनों और पर्यावरण प्रेमियों ने लगातार आंदोलन किए हैं। 500 से अधिक ज्ञापन प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को भेजे गए, जबकि 100 से अधिक जैन संतों ने सार्वजनिक रूप से इसका विरोध किया। इसके बावजूद सरकार की चुप्पी बनी हुई है।
सभा में यह भी कहा गया कि शुरुआत में इस आंदोलन को आम जनता का व्यापक समर्थन मिला, लेकिन समय के साथ लोगों में यह धारणा बन गई कि सरकार उनकी सुनवाई नहीं कर रही है। इसके बावजूद अलवर के समाजसेवी ओमप्रकाश गुप्ता लगातार इस मुद्दे को उठाते रहे हैं और इसे अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया है। हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के अलवर दौरे के दौरान भी उन्होंने इस विषय को प्रमुखता से उठाया।
वक्ताओं ने कहा कि जैन संतों—आचार्य सुधासागर, ज्ञानसागर महाराज और पुलक सागर सहित कई संतों ने भी इस मुद्दे को मंचों से उठाकर सरकार से संवेदनशील निर्णय लेने की अपील की है। उन्होंने इसे अहिंसा और पर्यावरण संरक्षण का प्रश्न बताते हुए समाज को जागरूक किया है।
धरने में उपस्थित लोगों ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने जल्द ही इस कानून को वापस नहीं लिया, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। अब हर समाज, हर वर्ग सड़कों पर उतरकर विरोध करेगा। साथ ही यह भी संकेत दिए गए कि यदि सरकार स्तर पर समाधान नहीं निकला, तो इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाया जाएगा।
अंत में वक्ताओं ने कहा कि सरकार के पास अभी भी अवसर है कि वह इस अधिसूचना को वापस लेकर अपनी संवेदनशीलता और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता दिखाए, अन्यथा यह आंदोलन आने वाले समय में और अधिक उग्र रूप ले सकता है।
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