हजारों स्कूल खस्ताहाल, शिक्षकों के करीब सवा लाख पद रिक्त , डंडा शिक्षकों पर

प्रदीप पंचोली, मिशनसच , अलवर।
राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था की मौजूदा तस्वीर बेहद चिंताजनक और चौंकाने वाली है। एक ओर जहां प्रदेश के हजारों सरकारी स्कूल जर्जर हालत में खड़े हैं, वहीं दूसरी ओर बच्चों के लिए पर्याप्त कक्षा-कक्ष और मूलभूत सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। इसके बावजूद सरकार द्वारा ‘प्रवेश उत्सव’ के नाम पर नामांकन बढ़ाने का अभियान चलाया जा रहा है, जिसने ग्रामीण क्षेत्रों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मैं यह बिल्कुल नहीं कह रहा हूं कि प्रवेशोत्सव नहीं चलाया जाना चाहिए, पर स्कूल में बच्चे के प्रवेश के लिए जाने वाले अविभावक के सवालों के जवाब भी वहां के अध्यापकों के पास होने चाहिए । फिलहाल की स्थिति में ज्यादातर स्थानों पर ये जवाब नहीं है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में 3587 स्कूल ऐसे हैं जिनके भवन पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं। इसके अलावा 83,783 कक्षा-कक्ष और 13,616 शौचालय भी जीर्ण अवस्था में हैं, जहां बच्चों को बैठाना तक सुरक्षित नहीं माना जा सकता। हालात इतने खराब हैं कि कई स्कूलों के बच्चों को पेड़ों के नीचे या अन्य भवनों में पढ़ाई करनी पड़ रही है। कई मामलों में इन वैकल्पिक स्थानों की दूरी भी काफी होती है, जिससे छोटे बच्चों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।
शौचालयों की स्थिति भी बेहद गंभीर बनी हुई है। छोटे स्कूलों को तो छोड़ो कई तो उच्च माध्यमिक विद्यालयों तक में शौचालय या तो टूटे-फूटे हैं या फिर उनमें पानी की कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे विशेष रूप से बालिकाओं की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
इसी बीच झालावाड़ में हुए दर्दनाक स्कूल हादसे, जिसमें 7 बच्चों की मौत और 21 घायल हुए थे, ने व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी थी। इसके बावजूद हालात में अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा है, जिससे सरकार की संवेदनशीलता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
शिक्षकों के करीब सवा लाख पद रिक्त
शिक्षकों के रिक्त पद भी शिक्षा व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं। प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग में लगभग सवा लाख पद खाली पड़े हैं, जिनमें करीब 42,000 वरिष्ठ अध्यापक और लगभग 17,000 व्याख्याता शामिल हैं। इन पदों को भरने के लिए सरकार की ओर से कोई स्पष्ट स्थिति नजर नहीं आ रही है।
जब शिक्षक ही उपलब्ध नहीं हैं, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे मिलेगी
11वीं कक्षा में प्रवेश लेने वाले छात्रों के सामने स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। यदि संबंधित विषय का व्याख्याता विद्यालय में नियुक्त नहीं होता, तो छात्र दो वर्षों तक विषयगत ज्ञान से वंचित रह जाता है। परिणामस्वरूप, वह किसी तरह 12वीं कक्षा उत्तीर्ण तो कर लेता है, लेकिन उसकी शैक्षणिक नींव कमजोर रह जाती है। इन सभी परिस्थितियों के बावजूद सरकार द्वारा ‘प्रवेश उत्सव’ मनाने के निर्देश दिए गए हैं। शिक्षक अपने स्तर पर विद्यालयों का प्रचार-प्रसार कर कुछ नामांकन तो बढ़ा लेते हैं, लेकिन अभिभावकों के इस सवाल का जवाब उनके पास भी नहीं होता कि बच्चों को बेहतर शिक्षा कब और कैसे मिलेगी।
ग्रामीण क्षेत्रों में अब यह सवाल जोर पकड़ रहा है,जब स्कूलों में न भवन हैं, न शिक्षक और न ही बुनियादी सुविधाएं, तो आखिर बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ने जाएं क्यों? शिक्षा व्यवस्था की यह स्थिति केवल लापरवाही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के साथ गंभीर खिलवाड़ के रूप में देखी जा रही है।
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