सीबी मसाला उद्योग का आज स्थापना दिवस है
आज के ही दिन लोहिया पाड़ी के एक कमरे से निकली खुशबू आज पूरे देश में फैली है
मिशन सच स्पेशल रिपोर्ट , अलवर। 1अप्रैल 1984। अलवर शहर की लोहिया पाड़ी का एक छोटा-सा कमरा। चार लोग। छोटी सी चक्की और एक सपना कि एक दिन इस मेहनत की खुशबू दूर-दूर तक पहुंचेगी।आज ठीक 42 साल बाद, 1 अप्रैल 2026 को जब हम उस सफर को पलट कर देखते हैं, तो समझ आता है कि असली मसाला तो बाबू झालानी की जिजीविषा में था उन मसालों में नहीं जो वे कूट रहे थे।
वो शुरुआत जो एक साधारण परिवार की होती है
बाबू झालानी। पूरा नाम, पूरी पहचान। लेकिन शुरुआत में न पहचान थी, न पूंजी, न बड़ी मशीनें। पिता छीतरमल खंडेलवाल के साथ लोहिया पाड़ी के उस छोटे से कमरे में मसाले बेचने का काम शुरू किया। हाथ से कूटो, पन्नी में पैक करो और बाजार में बेचो । यही था उनका पहला बिजनेस मॉडल। न कोई ब्रांडिंग, न कोई विज्ञापन, न कोई बड़ी रणनीति। लेकिन थी तो एक चीज और वो थी बेमिसाल मेहनत और मसालों की शुद्धता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता।
1992 : जब करवट बदली
आठ साल की अथक मेहनत के बाद 1992 में एक बड़ा बदलाव आया। लोहिया पाड़ी का वो एक कमरा अब इटाराणा रोड पर एक पूरी कंपनी में तब्दील हो चुका था। सीबा मसाला उद्योग यह नाम अब सिर्फ अलवर में नहीं, राजस्थान के कोने-कोने में गूंजने लगा था। और फिर राजस्थान की सरहदें भी छोटी पड़ गईं। धीरे-धीरे देश के अनेक राज्यों तक सीबा मसाला की सप्लाई पहुंचने लगी। वो मसाले जो कभी एक कमरे में हाथ से कूटे जाते थे, अब आधुनिक मशीनों से तैयार होकर लाखों घरों की रसोई तक पहुंच रहे थे।

ग्रामीण भारत , असली बाजार
बाबू झालानी की सोच शुरू से ही अलग रही। जब बड़े ब्रांड शहरों की चमक-दमक में उलझे थे, झालानी की नजर गांव पर टिकी थी। जहां असली भारत बसता है, जहां की रसोई में आज भी मसालों की असली कद्र होती है । वही उनका प्रमुख बाजार बना। और यह दूरदर्शिता ही उनकी सबसे बड़ी ताकत साबित हुई।
कोरोना के बाद जब उन्होंने पांच और दस रुपए के पाउच में मसाले बेचना शुरू किया, तो यह सिर्फ एक बिजनेस स्ट्रैटेजी नहीं थी । यह उस आम आदमी और उस ग्रामीण परिवार के बारे में सोचना था जो ब्रांडेड और शुद्ध मसाला चाहता है, लेकिन बड़े पैकेट की कीमत नहीं चुका सकता।
नई पीढ़ी, नई उड़ान
हर सफल उद्यमी की कहानी में एक पल होता है जब वो आगे बढ़ाता है। बाबू झालानी के जीवन में वो पल तब आया जब उनके दोनों बेटे शशांक झालानी और साहिल झालानी उद्योग में कदम रखने लगे। आधुनिक शिक्षा की रोशनी लेकर आए इन दोनों बेटों ने उद्योग की काया ही बदल दी। उत्पादन से लेकर अकाउंट्स तक, मार्केटिंग से लेकर सप्लाई चेन तक सब कुछ कंप्यूटराइज्ड और सिस्टमेटिक हो गया।
बाबू झालानी बड़े गर्व से बताते हैं — “जब से बच्चे आए हैं, व्यापार की सूरत बदल गई है।
वो चुनौती जो पूरे उद्योग को है
बाबू झालानी सिर्फ एक कारोबारी नहीं, एक जिम्मेदार नागरिक भी हैं। इसीलिए वो खुले मसालों की बिक्री को एक बड़ी समस्या मानते हैं।वे साफ कहते हैं — “खुले मसाले न सिर्फ हमारे बिजनेस के लिए, बल्कि आम आदमी के स्वास्थ्य के लिए भी खतरा हैं।”
कानूनी रूप से प्रतिबंधित होने के बावजूद बाजारों में खुले और मिलावटी मसाले धड़ल्ले से बिकते हैं। और इसका खामियाजा भुगतता है वो आम परिवार जो सस्ते के चक्कर में अपनी थाली में जहर परोस लेता है।
बिजनेस से अलग मस्ती का आलम
बाबू झालानी को सिर्फ मसालों की नहीं, रोशनी और रंगों की भी पहचान है।बचपन से ही फोटोग्राफी का शौक रखने वाले झालानी कॉलेज के दिनों में दोस्तों के साथ कैमरा उठाकर निकल पड़ते थे। आज भी यह शौक जिंदा है और सिर्फ जिंदा ही नहीं, बल्कि इतना परिपक्व हो चुका है कि उनकी खींची हुई तस्वीरें देश के सबसे बड़े हिंदी अखबार दैनिक भास्कर के मास्टहेड तक में उनके नाम के साथ प्रकाशित हुई हैं। एक उद्योगपति और एक कलाकार दोनों एक साथ। यही है बाबू झालानी की असली पहचान।प्रकृति उनकी सबसे प्रिय विषय है। वे कहते हैं फोटोग्राफी ने मुझे नेचर के करीब रखा है। और शायद यही प्रकृति से यह जुड़ाव उनके जीवन में वो संतुलन बनाए रखता है जो एक सफल इंसान के लिए सबसे जरूरी होता है।
टेनिस कोर्ट , स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा
बाबू झालानी का व्यक्तित्व सिर्फ कारखाने और कैमरे तक सीमित नहीं है।वे टेनिस के खिलाड़ी हैं और आज भी प्रतिदिन सुबह एक घंटे खेलते है। खेल उनके खून में है, इसीलिए खेल आयोजनों में सहयोग देना भी वे अपना फर्ज समझते हैं। प्रतिदिन एक घंटे योगा करना भी उनकी दिनचर्या का हिस्सा है।
सामाजिक दायित्व की बात करें तो अलवर के प्रतिष्ठित जयकृष्ण क्लब के वे दो बार सचिव रहे और उनका कार्यकाल क्लब के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है। उनके नेतृत्व में स्विमिंग पूल, जॉगिंग ट्रैक, बैडमिंटन कोर्ट, टेनिस जैसी तमाम सुविधाएं क्लब में जुड़ीं और पुरानी व्यवस्थाओं का कायापलट हो गया। इसके अलावा भी वे अपने समाज सहित विभिन्न सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी भी रहे। अलग अलग तरह के शिविर आदि भी लगाकर समाज सेवा करते रहे है।
युवाओं के नाम — दो बातें, दो सीख
42 साल के उद्यमशीलता के सफर के बाद बाबू झालानी के पास युवाओं को देने के लिए दो अनमोल सीखें हैं —
पहली: “आज आदमी पैसे के पीछे भाग रहा है, अपने लिए वक्त नहीं निकाल रहा। जबकि असली जरूरत स्वास्थ्य को ठीक रखने की है।”
दूसरी: “कोशिश करो कि दोस्ती अपने से कम उम्र के लोगों से हो ताकि हर रोज कुछ नया सीखते रहो।”
ये दो बातें किसी MBA की किताब में नहीं मिलेंगी। यह वो ज्ञान है जो 42 साल के संघर्ष, असफलताओं, सफलताओं और जिंदगी के असली अनुभवों से निकला है।
परिवार : उनकी असली दौलत
व्यापार की दुनिया में जहां अक्सर रिश्ते कमजोर पड़ जाते हैं, बाबू झालानी का परिवार उनकी सबसे मजबूत नींव है।पत्नी हेमलता — जिनकी परछाई हर मुश्किल में साथ रही। बेटी कृतिका — जो अब अपने घर में खुशहाल है। और दोनों बेटे शशांक व साहिल — जो अब उस सपने को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहे हैं जो उनके पिता ने 42 साल पहले एक छोटे से कमरे में देखा था।
उद्योग नहीं, एक इंसान के हौसले की कहानी
1 अप्रैल 1984 को जब बाबू झालानी ने पहली बार मसाला कूटा था, तो शायद उन्हें खुद भी नहीं पता था कि यह एक ऐसी यात्रा की शुरुआत है जो 42 साल बाद भी रुकेगी नहीं।
लोहिया पाड़ी के उस एक कमरे से इटाराणा रोड की कंपनी तक, अलवर से देश के कई राज्यों तक यह सिर्फ एक उद्योग की नहीं, एक इंसान के हौसले की कहानी है।
सीबा मसाला उद्योग आज सिर्फ एक ब्रांड नहीं है — यह उस मेहनत की खुशबू है जो चार लोगों के साथ शुरू हुई थी और आज लाखों घरों की रसोई तक पहुंचती है।
और बाबू झालानी? वे आज भी उतने ही जमीन से जुड़े हैं — प्रकृति की तस्वीर खींचते हुए, टेनिस कोर्ट पर रैकेट थामते हुए, और युवाओं को यह याद दिलाते हुए कि असली सफलता पैसे में नहीं, स्वास्थ्य और सीखने की ललक में है।
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