तीन-भाषा नीति पर सियासत: हिंदी थोपने का आरोप, संघवाद पर उठे सवाल
तिरुवनंतपुरम। एमके स्टालिन ने सीबीएसई के नए पाठ्यक्रम ढांचे को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने इसे भाषाई थोपने की सुनियोजित कोशिश बताते हुए आरोप लगाया कि यह नीति हिंदी को बढ़ावा देती है और क्षेत्रीय भाषाओं को कमजोर करती है।
स्टालिन ने कहा कि यह ढांचा देश के संघीय ढांचे को नुकसान पहुंचाता है और गैर-हिंदी भाषी राज्यों के साथ भेदभाव करता है। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि इससे छात्रों और शिक्षकों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा।
दरअसल, सीबीएसई 2026-27 शैक्षणिक सत्र से चरणबद्ध तरीके से तीन-भाषा नीति लागू करने जा रहा है, जिसकी शुरुआत कक्षा 6 से होगी। इस नीति के तहत छात्रों को एक अतिरिक्त भाषा सीखनी होगी और तीन भाषाओं में से कम से कम दो भारतीय भाषाएं अनिवार्य होंगी।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपने पोस्ट में स्टालिन ने कहा कि यह कोई साधारण शैक्षणिक सुधार नहीं, बल्कि एक सुनियोजित प्रयास है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा-नीत एनडीए सरकार एक केंद्रीकृत एजेंडा चला रही है, जो हिंदी को बढ़ावा देता है और देश की भाषाई विविधता को हाशिये पर डालता है।
स्टालिन ने तीन-भाषा फॉर्मूले को गैर-हिंदी राज्यों में हिंदी विस्तार का माध्यम बताते हुए कहा कि यह नीति हिंदी भाषी छात्रों को संरचनात्मक रूप से लाभ पहुंचाती है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या हिंदी भाषी राज्यों में तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, बंगाली या मराठी सीखना अनिवार्य किया जाएगा?
मुख्यमंत्री ने एआईएडीएमके और तमिलनाडु में उसके एनडीए सहयोगियों से भी सवाल किया कि क्या वे इस नीति का समर्थन करते हैं या छात्रों के अधिकार और पहचान की रक्षा के लिए खड़े होंगे।
उन्होंने केंद्र सरकार पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि जो सरकार केंद्रीय विद्यालयों में तमिल को अनिवार्य नहीं बना सकी, वह अब राज्यों को भाषाई नीति का पाठ पढ़ा रही है।
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