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    आसाराम आश्रम को बड़ा झटका: अवैध जमीन पर सरकार का कब्जा तय

    हाई कोर्ट के फैसले में आश्रम जमीन कब्जे को अवैध बताया, सरकार करेगी कार्रवाई

    गांधीनगर। गुजरात से एक बड़े कानूनी घटनाक्रम में हाई कोर्ट ने आसाराम आश्रम ट्रस्ट को करारा झटका दिया है। अहमदाबाद के मोटेरा क्षेत्र में स्थित इस विवादित आश्रम द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए अदालत ने साफ कर दिया है कि सरकारी जमीन पर किया गया अवैध कब्जा अब किसी भी हालत में बरकरार नहीं रहेगा।

    हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद राज्य सरकार लगभग 45,000 वर्ग मीटर की बेशकीमती जमीन को अपने कब्जे में लेने की प्रक्रिया शुरू करने जा रही है। यह जमीन रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    मामले की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डी.एन. रे की खंडपीठ ने आश्रम ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि आश्रम ने बार-बार सरकारी नियमों और शर्तों का उल्लंघन किया और धीरे-धीरे अतिरिक्त जमीन पर भी कब्जा बढ़ाया।

    अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि “अवैध कब्जे को वैध ठहराने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता। याचिकाकर्ता लगातार नियमों की अनदेखी करता रहा है।” कोर्ट ने सिंगल जज के उस पूर्व फैसले को भी सही ठहराया, जिसमें अहमदाबाद कलेक्टर द्वारा जारी बेदखली आदेश को वैध माना गया था।

    यह जमीन अहमदाबाद के मोटेरा इलाके में स्थित है और नरेंद्र मोदी स्टेडियम के नजदीक होने के कारण इसका महत्व और बढ़ जाता है। सरकार की योजना इस क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर की खेल सुविधाओं के रूप में विकसित करने की है।

    सूत्रों के अनुसार, सरकार 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स और भविष्य में संभावित ओलंपिक आयोजन को ध्यान में रखते हुए इस भूमि का उपयोग खेल इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए करना चाहती है। इसी कारण इसे एक ‘रणनीतिक जीत’ के रूप में भी देखा जा रहा है।

    अब राज्य सरकार गुजरात लैंड रेवेन्यू कोड की धारा 202 के तहत अंतिम नोटिस जारी कर जमीन का भौतिक कब्जा लेने की प्रक्रिया शुरू करेगी। इससे स्पष्ट है कि प्रशासन इस फैसले को जल्द अमल में लाने की तैयारी में है।

    वहीं, आश्रम ट्रस्ट ने सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के लिए चार सप्ताह की स्थगन अवधि (स्टे) की मांग की थी, लेकिन हाई कोर्ट ने इस पर भी कड़ी शर्त लगा दी है। अदालत ने कहा कि अंतरिम राहत तभी दी जा सकती है, जब आश्रम लिखित रूप में यह अंडरटेकिंग दे कि वह स्वेच्छा से जमीन खाली करेगा।

    इस फैसले को कानूनी विशेषज्ञों द्वारा एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है, जो अवैध कब्जों के खिलाफ सख्त रुख को दर्शाता है।

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