प्रकृति और संस्कृति के संतुलन से ही संभव है सतत विकास
जलपुरुष राजेन्द्र सिंह
वर्तमान दौर में विकास की जिस अवधारणा को अपनाया जा रहा है, वह भारतीय ज्ञान परंपरा और सामुदायिक जीवन मूल्यों के विपरीत खड़ी नजर आती है। विकास के नाम पर अपनाए गए तौर-तरीकों ने न केवल पारंपरिक ज्ञान को दरकिनार किया है, बल्कि सामाजिक संतुलन को भी प्रभावित किया है। यदि आजादी के बाद देश आदिज्ञान और परंपराओं के अनुरूप आगे बढ़ता, तो वर्तमान हालात कहीं अधिक संतुलित होते।
आज शासन-प्रशासन का संवाद सीमित होकर एक त्रिगुट—ठेकेदार, व्यापारी और नेता—तक सिमट गया है। इसके चलते समाज में विभाजन बढ़ा है और व्यवस्था में दलाली की प्रवृत्ति मजबूत हुई है। उद्योगपतियों, नेताओं और अधिकारियों की संयुक्त भूमिका ने विकास के नाम पर कई बार विनाशकारी परिणाम ही दिए हैं। यही कारण है कि आज का विकास मॉडल जलवायु परिवर्तन के बड़े संकट के रूप में सामने आया है, जिसने गरीब वर्ग के लिए जीवन, जीविका, जमीन और जमीर तक को संकट में डाल दिया है।
यह संकट अब किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अरावली से निकलकर पूरे देश में फैल चुका है। इससे निपटने के लिए विकास की परिभाषा, दिशा और नीतियों में व्यापक बदलाव आवश्यक है। समाज का एक बड़ा वर्ग अब इस सच्चाई को समझने लगा है, हालांकि जो लोग इस पर सवाल उठाते हैं, उन्हें अक्सर विकास विरोधी कहकर नजरअंदाज किया जाता रहा है।
भारतीय लोकतंत्र के मूल में निहित अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 48(ए) पर्यावरण और जीवन की सुरक्षा के महत्वपूर्ण आधार हैं। इनकी अनदेखी अब स्वीकार्य नहीं होगी। यदि इनका पालन नहीं हुआ, तो भविष्य में पर्यावरण और जलवायु के मुद्दों पर व्यापक जनआंदोलन खड़ा हो सकता है, जैसा कि हाल के वर्षों में देखने को मिला है।
आज जलवायु परिवर्तन ने पहाड़ों, नदियों और प्राकृतिक संसाधनों को गहरे संकट में डाल दिया है। पहले जहां रोटी, कपड़ा और मकान जैसे मुद्दे प्रमुख थे, वहीं अब जीवन, जीविका और स्वास्थ्य सुरक्षा सीधे पर्यावरण से जुड़ गए हैं। यह केवल प्रशासनिक या राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रश्न बन चुका है।
संविधान का उद्देश्य केवल संकट के बाद समाधान देना नहीं, बल्कि पहले से चेतावनी देकर भविष्य के खतरों से बचाना भी है। अनुच्छेद 21 के तहत जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है, और पर्यावरण संरक्षण उसी का अभिन्न हिस्सा है। न्यायपालिका और सरकार दोनों को मिलकर इस दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।
केवल आर्थिक प्रगति से किसी देश का वास्तविक विकास संभव नहीं है। संस्कृति और प्रकृति के संरक्षण से ही स्थायी विकास का मार्ग निकलता है। यही वह आधार है, जो गरीबी, बेरोजगारी और सामाजिक असंतुलन जैसी समस्याओं का समाधान कर सकता है।
वर्तमान विकास मॉडल ने प्रकृति और समता की संस्कृति की अनदेखी की है, जिसके परिणामस्वरूप वैश्विक तापमान वृद्धि, असामान्य मौसम और प्राकृतिक आपदाओं की घटनाएं बढ़ी हैं। वास्तविक विकास वही है, जो प्रकृति और संस्कृति के संतुलन पर आधारित हो, न कि विस्थापन और विनाश पर।
पर्वतों का अंधाधुंध दोहन और खनन कभी भी सतत विकास का हिस्सा नहीं हो सकता। प्रकृति के अंगों को नष्ट कर विकास संभव नहीं है। जैसे शरीर के कुछ हिस्से कटने पर वापस नहीं आते, वैसे ही प्रकृति के स्थायी संसाधनों का नुकसान भी अपूरणीय होता है। इसलिए प्रकृति का शोषण नहीं, बल्कि उसका संरक्षण और सम्मान आवश्यक है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम विकास की परिभाषा को पुनः परिभाषित करें और संविधान के मूल सिद्धांतों का पालन करते हुए प्रकृति और संस्कृति के संतुलन को बनाए रखें। यही मार्ग हमें जलवायु संकट से बाहर निकाल सकता है, अन्यथा विकास के नाम पर विनाश का यह सिलसिला जारी रहेगा।

