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बंगाल विजय पर हर अलवर वाला भी खुश
सोशल मीडिया से
बंगाल विजय ने सचमुच हर भारतीय की रग-रग में खुशी का संचार कर दिया है। यह केवल एक राजनीतिक जीत नहीं, बल्कि एक लंबे संघर्ष, धैर्य और संकल्प की ऐतिहासिक परिणति है।
इस स्वर्णिम विजय के साक्षी बनने की तीव्र इच्छा ने मुझे भी चैन से बैठने नहीं दिया। 4 तारीख की सुबह ही मैंने कोलकाता (कलकत्ता) की ओर रुख कर लिया। उस समय शहर की सुबह कुछ अलसाई, कुछ शांत और कहीं न कहीं भय व आशंका से भरी प्रतीत हो रही थी। वातावरण में अनिश्चितता साफ झलक रही थी।
लेकिन जैसे-जैसे मतगणना आगे बढ़ी, वही अलसाई सुबह धीरे-धीरे उत्साह और उमंग में बदलने लगी। साल्ट लेक स्थित पार्टी कार्यालय में कार्यकर्ताओं की भावनाएं उमड़ पड़ीं। वर्षों की पीड़ा, संघर्ष और इंतजार नृत्य, जयकारों और आंखों से बहते अश्रुओं में स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
शहर की गलियों और नुक्कड़ों पर महिलाओं, पुरुषों, बच्चों और उन कार्यकर्ताओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा, जो कभी भय के कारण घर से निकलने में भी हिचकिचाते थे। आज वही लोग खुलकर जश्न मना रहे थे—नाचते, गाते और खुशी से सराबोर। आश्चर्य की बात यह थी कि तथाकथित दबदबे वाले तत्वों का कहीं कोई अस्तित्व नजर नहीं आ रहा था।
पार्टी कार्यालय में सबसे अधिक उत्सुकता उस व्यक्तित्व की एक झलक पाने की थी, जिसे इस ऐतिहासिक विजय का नायक माना जा रहा था। बड़े-बड़े राजनीतिक दिग्गज भी उनके सामने नतमस्तक नजर आए।
वह व्यक्तित्व, जिन्हें लोग सम्मान से संबोधित करते हैं—
“रॉयल अरावली टाइगर”
और आज के संदर्भ में
“रॉयल बंगाल टाइगर”
भूपेंद्र यादव
अलवर में उनकी सहजता के कारण उनकी विराटता का पूर्ण आभास नहीं हो पाता, लेकिन कोलकाता की धरती पर उनकी नेतृत्व क्षमता, प्रभाव और व्यक्तित्व की विशालता स्वयं प्रकट हो रही थी। माहौल ही उनके कद का परिचायक बन गया था। टीवी और मीडिया में जिन बड़े चेहरों को हम देखते हैं, वे भी उनके सामने सम्मानपूर्वक उपस्थित थे। यह दृश्य अपने आप में बहुत कुछ कह रहा था। इस भव्यता के बीच उनका सरल और अपनापन भरा व्यवहार मन को छू गया। बड़े स्नेह से वे सभी को “सरस का कलाकंद” खिलाते हुए कहते—“ये हमारे अलवर का है।” इतना ही नहीं, मेरे जैसे एक साधारण कार्यकर्ता का भी वे गर्व से परिचय करवा रहे थे।
हमेशा की तरह सुबह से शाम तक उन्हें कुछ खाते-पीते नहीं देखा। उनकी ऊर्जा का स्रोत क्या है, यह आज भी एक रहस्य ही प्रतीत होता है। उनकी कार्यशैली और ऊर्जा सचमुच अद्भुत है। उन्होंने एक ऐसे दुर्ग को ध्वस्त किया, जिसे अभेद्य माना जाता था। और इस ऐतिहासिक सफलता के बाद भी उनके चेहरे पर पूर्ण निश्चिंतता । मानो यह विजय पहले ही उनके मन में साकार हो चुकी थी, बस उसे वास्तविकता में बदलना बाकी था।
रात्रि में सभी दायित्वों से मुक्त होते ही वे सीधे अपने इष्ट के चरणों में पहुंचे और इस विजय को समर्पित किया। और अगली सुबह साढ़े चार बजे फिर उसी समर्पण भाव के साथ उपस्थित हो गए।
इस सबको देखकर मन में यही विचार आया कि शायद कोई दैवीय शक्ति ही उनके शरीर, आत्मा और उनकी निरंतर सफलता के क्रम का पोषण कर रही है। हम सभी स्वयं को धन्य मानते हैं कि हमें उनका नेतृत्व, आशीर्वाद और सान्निध्य प्राप्त हुआ।
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