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    कोर्ट ने नारायण साई की सजा रोकने से किया इनकार, केस में बड़ा झटका

    अहमदाबाद: नारायण साई को गुजरात हाई कोर्ट से बड़ा झटका, दुष्कर्म मामले में सजा रोकने और जमानत की अर्जी हुई खारिज

    स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम के पुत्र नारायण साई की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं, क्योंकि गुजरात हाई कोर्ट ने उम्रकैद की सजा को निलंबित करने की उसकी याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया है। साल 2001 के एक दुष्कर्म मामले में सूरत की निचली अदालत द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा के विरुद्ध नारायण साई की मुख्य अपील अभी भी उच्च न्यायालय में लंबित है। सोमवार को न्यायमूर्ति इलेश वोरा और न्यायमूर्ति आरटी वच्छानी की खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए साफ किया कि वर्तमान परिस्थितियों में दोषी को किसी भी प्रकार की राहत देना संभव नहीं है। अदालत के इस कड़े रुख ने नारायण साई की जेल से बाहर आने की उम्मीदों पर फिलहाल पानी फेर दिया है।

    अपराध की गंभीरता और बरी होने की क्षीण संभावनाओं पर अदालत की टिप्पणी

    हाई कोर्ट की खंडपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि नारायण साई द्वारा किए गए अपराध की प्रकृति अत्यंत गंभीर है। पीठ ने कहा कि साक्ष्यों और मामले की गहराई को देखते हुए प्रथम दृष्टया यह निष्कर्ष निकालना बेहद कठिन है कि अपीलीय अदालत में सुनवाई के दौरान आवेदक के बरी होने की कोई उचित संभावना नजर आती है। अदालत ने गुण-दोष के आधार पर यह पाया कि सजा के निलंबन या नियमित जमानत के लिए कोई भी ठोस और पर्याप्त आधार मौजूद नहीं है। जजों ने यह भी रेखांकित किया कि ऐसे जघन्य अपराधों में बिना किसी असाधारण कारण के सजा पर रोक लगाना न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध होगा।

    सुनवाई में सहयोग न करने और कानूनी कार्यवाही में देरी के हथकंडों पर फटकार

    अदालत ने नारायण साई के आचरण पर कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि हालांकि वह पिछले 11 वर्षों से जेल की सजा काट रहा है, लेकिन उसने वर्ष 2019 से अपनी मुख्य अपील की अंतिम सुनवाई में बिल्कुल भी सहयोग नहीं किया है। हाई कोर्ट ने गौर किया कि दोषी ने अपील को तार्किक परिणति तक पहुँचाने के बजाय कई बार अस्थायी या स्थायी जमानत के लिए याचिकाएं दायर कर मामले को लंबा खींचने का प्रयास किया है। पीठ के अनुसार, साई ने कार्यवाही में देरी करने के लिए विभिन्न कानूनी हथकंडे अपनाए, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उसे अपनी अपील की शीघ्र सुनवाई में कोई वास्तविक रुचि नहीं थी। अदालत ने इसे न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग की श्रेणी में रखा।

    साल 2013 का मामला और उम्रकैद के बाद बार-बार पैरोल की मांग

    इस पूरे विवाद की जड़ साल 2013 में दर्ज हुई वह शिकायत है, जिसमें एक पूर्व महिला भक्त ने नारायण साई पर गंभीर यौन शोषण के आरोप लगाए थे। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अप्रैल 2019 में सूरत की अदालत ने उसे दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। अपनी सजा के दौरान नारायण साई कई बार पैरोल या फर्लो के जरिए जेल से बाहर आता रहा है, लेकिन नियमित जमानत पाने के उसके तमाम प्रयास अब तक विफल रहे हैं। वर्तमान फैसले ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि जब तक उसकी मुख्य अपील पर अंतिम फैसला नहीं आ जाता, उसे सलाखों के पीछे ही रहना होगा। पुलिस और अभियोजन पक्ष ने भी सुरक्षा और गवाहों के प्रभावित होने के डर से उसकी रिहाई का पुरजोर विरोध किया था।

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