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    बिहार मंत्रिमंडल में आखिरी वक्त तक चला मंथन, जातीय समीकरण पर खास फोकस

    पटना: बिहार की राजनीति में जातीय समीकरणों की अहमियत को देखते हुए हालिया मंत्रिमंडल विस्तार में सामाजिक संतुलन साधने की पुरजोर कोशिश की गई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली इस नई टीम में भाजपा और जदयू सहित सहयोगी दलों ने अपनी चुनावी बिसात को ध्यान में रखकर चेहरों का चयन किया है। जहाँ एक ओर भाजपा ने अपने अनुभवी चेहरों की जगह नए जातीय समीकरणों को तरजीह दी है, वहीं जदयू ने भी अपने कुनबे को विस्तार देते हुए कई चौंकाने वाले निर्णय लिए हैं। वर्तमान नियमों के अनुसार अधिकतम 36 मंत्रियों की सीमा को ध्यान में रखते हुए इस बार कई कद्दावर नेताओं को सूची से बाहर रहना पड़ा है।

    सत्ता के गलियारों में चौंकाने वाले बदलाव और नए उदय

    बिहार के राजनैतिक घटनाक्रम में सबसे अधिक चर्चा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार के मंत्री पद की शपथ लेने की रही, जिसे परिवारवाद के खिलाफ रहने वाली जदयू की रणनीति में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। दूसरी ओर, भाजपा के दिग्गज नेता और पश्चिम बंगाल के प्रभारी मंगल पांडेय का नाम अंतिम सूची से कटना भी सबको हैरान कर गया। माना जा रहा है कि ब्राह्मण कोटे से नीतीश मिश्रा और मिथिलेश तिवारी के नाम शामिल होने के कारण जातीय संतुलन बिठाने के चक्कर में मंगल पांडेय को जगह नहीं मिल सकी।

    राजधानी और कायस्थ समाज की प्रतिनिधित्व पर चर्चा

    मंत्रिमंडल विस्तार के बाद पटना के शहरी क्षेत्र और कायस्थ समाज के प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नितिन नवीन के पदभार संभालने के बाद रिक्त हुई मंत्री पद की जगह पर किसी कायस्थ चेहरे को मौका नहीं मिला है, जिससे सोशल मीडिया पर समाज के लोगों में नाराजगी देखी जा रही है। इस नए फेरबदल के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

    • शहरी प्रतिनिधित्व का अभाव: पटना शहर से नितिन नवीन के बाद अब मंत्रिमंडल में कोई भी स्थानीय चेहरा शामिल नहीं है।

    • कायस्थ भागीदारी शून्य: बिहार के निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले कायस्थ समाज से इस बार एक भी विधायक को मंत्री पद नहीं मिला है।

    • संजीव चौरसिया की अनदेखी: पटना से प्रबल दावेदार माने जा रहे संजीव चौरसिया को भी इस विस्तार में जगह नहीं मिल पाई है।

    • सोशल मीडिया पर आक्रोश: प्रतिनिधित्व न मिलने से नाराज समर्थक और समाज के लोग ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं।

    दलों के भीतर जातीय भागीदारी का विस्तृत विवरण

    मंत्रिमंडल के 36 सदस्यों के चयन में अति पिछड़ा वर्ग (EBC), दलित और पिछड़ा वर्ग (OBC) को विशेष प्राथमिकता दी गई है ताकि समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलने का संदेश दिया जा सके। गठबंधन के विभिन्न दलों की भागीदारी के प्रमुख तथ्य इस प्रकार हैं:

    • भाजपा का समीकरण: भाजपा के 16 मंत्रियों में रामकृपाल यादव (OBC), विजय कुमार सिन्हा (भूमिहार), श्रेयसी सिंह (राजपूत) और लखेंद्र पासवान (दलित) जैसे नाम शामिल हैं, जहाँ EBC चेहरों पर बड़ा दांव लगाया गया है।

    • जदयू की रणनीति: मुख्यमंत्री के दल ने 15 मंत्रियों के साथ अपना दबदबा बनाए रखा है, जिसमें निशांत कुमार और श्रवण कुमार (कुर्मी), अशोक चौधरी (दलित) और जमा खान (अल्पसंख्यक) को स्थान मिला है।

    • सहयोगी दलों का हिस्सा: चिराग पासवान की पार्टी से संजय पासवान और संजय सिंह को जगह मिली है, जबकि संतोष मांझी (हम-से) और दीपक प्रकाश (रालोमो) ने भी अपने-अपने दलों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया है।

    • संतुलन की कोशिश: पूरी सूची में राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण और विभिन्न पिछड़ी जातियों के बीच सत्ता की हिस्सेदारी को बारीकी से बांटने का प्रयास किया गया है।

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