More
    Homeबिजनेसप्राइवेट स्कूलों की चमक के पीछे छिपी हकीकत, सरकारी स्कूल क्यों पिछड़...

    प्राइवेट स्कूलों की चमक के पीछे छिपी हकीकत, सरकारी स्कूल क्यों पिछड़ रहे

    नई दिल्ली: नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट ने भारत के स्कूली शिक्षा ढांचे में आ रहे व्यापक बदलावों की ओर इशारा करते हुए एक गंभीर बहस छेड़ दी है। पिछले दो दशकों के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय माता-पिता का भरोसा अब सरकारी व्यवस्था के बजाय निजी शिक्षण संस्थानों पर तेजी से बढ़ रहा है, जिसके परिणामस्वरूप सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या में भारी गिरावट आई है। यह बदलाव न केवल शिक्षा की गुणवत्ता और समानता पर सवाल खड़ा करता है बल्कि भविष्य की आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों की ओर भी संकेत करता है, जिससे निपटने के लिए नीतिगत स्तर पर बड़े सुधारों की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

    सरकारी स्कूलों के प्रति घटता रुझान और निजी संस्थानों का विस्तार

    आंकड़ों की दृष्टि से देखें तो पिछले बीस वर्षों में शिक्षा के परिदृश्य में अभूतपूर्व परिवर्तन आया है जहां साल 2005 में लगभग इकहत्तर प्रतिशत बच्चे सरकारी विद्यालयों का हिस्सा थे वहीं वर्तमान शैक्षणिक सत्र तक यह आंकड़ा सिमटकर आधे से भी कम यानी लगभग उनचास प्रतिशत रह गया है। अभिभावकों के बीच यह धारणा प्रबल हो रही है कि निजी स्कूल अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा, बेहतर अनुशासन और भविष्य में रोजगार के अधिक अवसर प्रदान करते हैं, इसी सोच के कारण मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवार भी अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा निजी संस्थानों पर खर्च कर रहे हैं। हालांकि रिपोर्ट इस बात पर भी प्रकाश डालती है कि कई निजी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव है, जिससे अभिभावकों की उम्मीदें और वास्तविक परिणाम मेल नहीं खा रहे हैं।

    शिक्षकों की कमी और बुनियादी ढांचे की जर्जर स्थिति

    देश भर के लाखों स्कूलों में करोड़ों शिक्षकों की मौजूदगी के बावजूद ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है क्योंकि वहां शिक्षकों की भारी कमी और उनके नौकरी छोड़ने की दर बहुत अधिक है। सबसे बड़ी समस्या उन स्कूलों की है जो केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं, जिनकी संख्या कुल स्कूलों का सात प्रतिशत से भी अधिक है और ऐसी स्थिति में छात्रों को सीखने के सही अवसर नहीं मिल पाते हैं। इसके अतिरिक्त शिक्षकों पर प्रशासनिक कार्यों का बढ़ता बोझ, विषय विशेषज्ञता का अभाव और संसाधनों की कमी जैसे कारकों ने शिक्षा की नींव को कमजोर किया है, जिससे विशेषकर कम फीस वाले निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का शैक्षणिक स्तर अपेक्षा के अनुरूप नहीं पाया गया है।

    भविष्य की तकनीकी शिक्षा और क्रियान्वयन की चुनौतियां

    आधुनिक दौर की जरूरतों को देखते हुए शिक्षा मंत्रालय ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत प्राथमिक स्तर से ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और कंप्यूटेशनल थिंकिंग जैसे विषयों को अनिवार्य कौशल के रूप में शामिल करने का निर्णय लिया है। सीबीएसई और एनसीईआरटी इस नए पाठ्यक्रम को तैयार करने में जुटे हैं ताकि कक्षा तीन से ही बच्चों को भविष्य की तकनीक के लिए तैयार किया जा सके, लेकिन रिपोर्ट इसे लागू करने की राह में आने वाली बाधाओं के प्रति भी सचेत करती है। स्कूलों में बिजली, इंटरनेट और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी इन तकनीकी विषयों के प्रभावी क्रियान्वयन में एक बड़ा रोड़ा साबित हो सकती है, जिसके लिए बुनियादी ढांचे को मजबूत करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

    latest articles

    explore more

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here