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    सूरत की फैक्ट्रियों से 91 मासूम बच्चों को उदयपुर वापस लाया गया

    उदयपुर। राजस्थान के सुदूर आदिवासी अंचलों से मासूम बच्चों को झूठे झांसे देकर पड़ोसी राज्य गुजरात के औद्योगिक कारखानों में बंधक बनाने वाले एक बेहद क्रूर और बड़े अंतरराज्यीय रैकेट का पर्दाफाश हुआ है। सूरत शहर की सीताराम और मुक्तिधाम सोसायटियों में जब राजस्थान व गुजरात पुलिस के साथ राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) की संयुक्त टीमों ने अचानक धावा बोला, तो वहां का खौफनाक नजारा देखकर खुद जांच अधिकारी भी दंग रह गए। कारखानों की बंद दीवारों के पीछे नन्हे-नन्हे बच्चों की जिंदगी दांव पर लगी हुई थी, जिनसे बेहद तीखे कटर और कढ़ाई मशीनों पर खतरनाक काम लिया जा रहा था, जिससे उनके जीवन पर हर पल मौत का साया मंडरा रहा था।

    अंधकारमय और संकरे कमरों में सिसकती मासूमियत और बचपन का दर्द

    सूरत की बेहद तंग गलियों में संचालित कपड़ा और पैकेजिंग इकाइयों के भीतर छापेमारी के दौरान बेहद मर्मस्पर्शी और विचलित करने वाले दृश्य देखने को मिले। कारखानों के अंधेरे और घुटन भरे कमरों में जैसे ही पुलिस की टीम पहुंची, तो वहां मौजूद महज सात साल का एक मासूम बच्चा बिना कपड़ों के डर और दहशत से कांपता हुआ पाया गया, जो खाकी वर्दी को देखते ही जोर-जोर से रोने लगा और खुद को छुपाने का प्रयास करने लगा। रेस्क्यू किए गए इन इक्यानबे बच्चों में अधिकांश मासूम राजस्थान के उदयपुर जिले के कोटड़ा, झाड़ोल और खेरवाड़ा जैसे धुर आदिवासी और पिछड़े क्षेत्रों के रहने वाले हैं, जिनमें दो सगे भाई भी शामिल हैं, जिन्हें उनके माता-पिता से अच्छी जिंदगी देने का वादा करके छीना गया था। इसके साथ ही इस नरक में उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के भी कई मासूम बच्चे गुलामी की जिंदगी जीने को विवश थे।

    चौदह घंटे की जानलेवा शिफ्ट और अपनों से मिलने की तड़प

    इन अभागे बच्चों की पूरी दुनिया मशीनों के गगनभेदी शोर, साड़ियों की छपाई में इस्तेमाल होने वाले खतरनाक रसायनों और जहरीले धुएं के बीच ही कैद होकर रह गई थी। शुरुआती पूछताछ और जांच में यह सच सामने आया है कि इन मासूमों से बिना किसी साप्ताहिक अवकाश या आराम के रोजाना बारह से चौदह घंटे तक लगातार बंधुआ मजदूरों की तरह कड़ा काम कराया जाता था। इनमें से कई बच्चे तो ऐसे थे जो पिछले तीन-चार सालों से अपने परिवार और माता-पिता की शक्ल तक नहीं देख पाए थे, क्योंकि उन्हें केवल 'सूरत की सैर' कराने का झांसा देकर लाया गया था और यहां आते ही उन्हें फैक्ट्रियों में हमेशा के लिए कैद कर दिया गया था।

    सत्ताईस कारखाना मालिकों के खिलाफ मुकदमा और सामाजिक विडंबना पर प्रहार

    इस पूरे ऐतिहासिक रेस्क्यू ऑपरेशन की रूपरेखा ‘गायत्री सेवा संस्थान’ द्वारा दी गई एक बेहद गोपनीय और पुख्ता सूचना के आधार पर तैयार की गई थी, जिसके बाद दोनों राज्यों के बाइस शीर्ष पुलिस अधिकारियों की एक विशेष टीम ने योजनाबद्ध तरीके से जाल बिछाया। सूरत के पुणागाम थाना पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए क्षेत्र की उन सत्ताईस टेक्सटाइल और पैकेजिंग फैक्ट्रियों के मालिकों के खिलाफ नामजद आपराधिक मामला दर्ज किया है जहां इन बच्चों का शोषण हो रहा था। हालांकि कार्रवाई के दौरान फैक्ट्री संचालकों ने बच्चों के परिजनों को एडवांस पैसे देने की दलील देकर खुद को बचाने की कोशिश की, लेकिन पुलिस और आयोग ने साफ कर दिया कि चौदह वर्ष से कम आयु के बच्चों से ऐसा जोखिम भरा काम कराना गैर-जमानती और अक्षम्य अपराध है। इस जांच ने आदिवासी अंचलों में फैली भयंकर गरीबी और स्कूलों से पढ़ाई छोड़ने की दर जैसी कड़वी सामाजिक सच्चाई को भी एक बार फिर उजागर कर दिया है, जिसका फायदा उठाकर बाल श्रम माफिया के स्थानीय दलाल इन परिवारों को चंद रुपयों का लालच देकर बच्चों की तस्करी करते हैं।

    शेल्टर होम में पुनर्वास की प्रक्रिया और मुख्य सरगनाओं की तलाश तेज

    वर्तमान में मुक्त कराए गए सभी बच्चों को पूरी सुरक्षा के साथ सरकारी शेल्टर होम्स और बाल सुधार गृहों में भेज दिया गया है, जहां मनोचिकित्सकों और विशेषज्ञों की देखरेख में उनके पुनर्वास और काउंसलिंग की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है ताकि उन्हें इस सदमे से बाहर निकाला जा सके। स्थानीय थाना प्रभारी वी.एम. देसाई ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए बताया कि कानून की सबसे सख्त धाराओं के तहत केस दर्ज कर कार्रवाई को आगे बढ़ाया जा रहा है। पुलिस अब उन मुख्य एजेंटों, दलालों और मानव तस्करी के सिंडिकेट की एक विस्तृत सूची तैयार कर रही है जो राजस्थान और अन्य राज्यों के ग्रामीण इलाकों से बच्चों की सप्लाई इस औद्योगिक नगरी में करते थे, और बहुत जल्द इस पूरे रैकेट के मुख्य सरगनाओं को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेजा जाएगा।

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